नई दिल्ली। दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश भारत इस समय चीनी के बढ़ते सरप्लस की चुनौती का सामना कर रहा है। ऐसे में सरकार ने साफ संकेत दिए हैं कि गन्ना किसानों की आय को किसी भी हाल में नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने गुरुवार को बताया कि अतिरिक्त चीनी स्टॉक को संभालने के लिए सरकार निर्यात बढ़ाने और इथेनॉल उत्पादन में ज्यादा से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करने की रणनीति पर तेजी से काम कर रही है।
सरकार की रणनीति क्या है
सरकार के अनुमान के मुताबिक 2025-26 के विपणन वर्ष (अक्टूबर से शुरू) में चीनी उत्पादन करीब 18% बढ़कर 30.9 मिलियन मीट्रिक टन पहुंच सकता है। इसमें से लगभग 3.4 मिलियन टन चीनी इथेनॉल के लिए इस्तेमाल की जाएगी, इसके बावजूद घरेलू खपत करीब 29 मिलियन टन रहने की उम्मीद है। यानी बाजार में अतिरिक्त चीनी साफ नजर आ रही है। खाद्य सचिव ने कहा कि अगर इस सरप्लस को समय रहते नहीं संभाला गया तो इसका सीधा नुकसान किसानों को होगा, जिसे सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी।
फिलहाल सरकार ने 15 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी है और आने वाले महीनों में निर्यात कोटा बढ़ाने पर भी फैसला लिया जा सकता है। इसके साथ ही गन्ना आधारित इथेनॉल के हिस्से को बढ़ाने पर भी विचार चल रहा है, ताकि चीनी मिलों की नकदी स्थिति बेहतर हो सके। उद्योग लंबे समय से चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी की मांग कर रहा है, जिस पर सरकार विचार कर रही है।
कीमतों और बाजार पर असर
चीनी के बढ़ते अधिशेष का असर घरेलू बाजार में कीमतों पर दिखने लगा है। मिल गेट पर चीनी के दाम ₹36.5 से ₹39.5 प्रति किलो तक आ गए हैं। महाराष्ट्र में चीनी मिलों पर किसानों का बकाया करीब ₹2,000 करोड़ तक पहुंच चुका है। सरकार का कहना है कि किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए वह पूरी तरह सतर्क है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत से ज्यादा निर्यात का असर पड़ सकता है। न्यूयॉर्क और लंदन में चीनी फ्यूचर्स पहले ही कई साल के निचले स्तर के आसपास हैं। हालांकि सरकार का मानना है कि यह रणनीति किसानों की रक्षा करेगी, मिलों की लिक्विडिटी बनाए रखेगी और 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग लक्ष्य को पूरा करने में मदद करेगी। इस पूरे मुद्दे पर अंतिम फैसला जनवरी में लिया जाना है।