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क्या तेल त्रिकोण में फंस गयी है एनर्जी डिमांड और जियोपॉलिटिक्स ? अमेरिकी दबाव और वेनेज़ुएला की एंट्री के बीच किस राह चलेगा भारत ?

Gopal Singh
Last updated: January 31, 2026 1:53 pm
Gopal Singh
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भारत तेल आयात जियोपॉलिटिक्स
भारत तेल आयात जियोपॉलिटिक्स
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नई दिल्ली: वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक नया समीकरण बन रहा है। अमेरिका ने भारत को वेनेज़ुएला से तेल खरीदने की अनुमति देकर एक स्पष्ट संदेश दिया है कि वह भारत को रूसी तेल आयात से दूर ले जाना चाहता है। यह केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं है, बल्कि इसके पीछे जटिल भू-राजनीतिक रणनीति और राजनयिक दबाव की पूरी कहानी है। हाल ही में वेनेज़ुएला की कार्यकारी राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई बातचीत ने इस मुद्दे को और हवा दे दिया है। सवाल यह है कि क्या यह भारत के लिए एक सुनहरा अवसर है, या फिर एक नई जटिलता जो देश की रणनीतिक स्वायत्तता को प्रभावित कर सकती है?

क्या है अमेरिका का मास्टर प्लान ?

अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से तेल खरीदना कम करे। और इसके लिए उसने एक दिलचस्प ऑफर दिया है: वेनेज़ुएला से तेल खरीदो। जनवरी 2026 में अमेरिका ने वेनेज़ुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार किया और वहां के तेल कारोबार पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली।

अब अमेरिका कह रहा है कि वो वेनेज़ुएला की तेल इंडस्ट्री को फिर से खड़ा करेगा। विटोल और ट्रैफिगुरा जैसी बड़ी ट्रेडिंग कंपनियों को वेनेज़ुएला का तेल बेचने की इजाज़त मिल गई है। लेकिन असलियत ये है कि ज्यादातर तेल अमेरिका ही खरीद रहा है, भारत जैसे देशों को बस थोड़ा-बहुत मिल रहा है।

दिलचस्प बात ये है कि खुद अमेरिकी कंपनियां – एक्सॉन मोबिल और कोनोकोफिलिप्स – वेनेज़ुएला में निवेश करने से कतरा रही हैं। क्यों? क्योंकि वहां पहले भी उनकी संपत्ति जब्त हो चुकी है, राजनीतिक हालात अस्थिर हैं, और इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत कमजोर है। ट्रंप 100 अरब डॉलर के निवेश की बात कर रहे हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स इसे हवा-हवाई मानते हैं।

भारत और वेनेज़ुएला का पुराना नाता

अब बात करते हैं भारत की। दरअसल, भारत का वेनेज़ुएला से रिश्ता नया नहीं है। हमारी ओएनजीसी विदेश (OVL) वहां सालों से काम कर रही है—सैन क्रिस्टोबाल में 40% और काराबोबो-1 में 11% हिस्सेदारी है। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से करीब 500-600 मिलियन डॉलर का डिविडेंड अटका पड़ा है। रिलायंस इंडस्ट्रीज भी वेनेज़ुएला से पुराना कारोबारी रिश्ता रखती है और अब अमेरिका से परमिशन लेकर दोबारा तेल खरीदने की तैयारी में है।

30 जनवरी 2026 को प्रधानमंत्री मोदी और वेनेज़ुएला की कार्यकारी राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज के बीच जो बातचीत हुई, वो काफी अहम मानी जा रही है। खासकर इसलिए क्योंकि ट्रंप ने रूस से तेल आयात पर 25% टैरिफ की धमकी दे रखी है। मतलब साफ है—रूस से दूर हटो, वेनेज़ुएला की तरफ बढ़ो।

भारत की चिंता- रूस को छोड़ें या नहीं?

यहीं पर भारत की असली दुविधा है। देखिए, अमेरिका की मंशा साफ है—वो रूस की तेल से होने वाली कमाई पर लगाम लगाना चाहता है। भारत ने 2022 के बाद से रूसी तेल खूब खरीदा है, और अब धीरे-धीरे इसे कम कर रहा है।

वेनेज़ुएला का भारी कच्चा तेल रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी के लिए परफेक्ट है, तो ऑफर अच्छा लगता है। लेकिन एक पल रुकिए—रूस सिर्फ तेल का सप्लायर नहीं है, वो भारत का पुराना और भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार भी है।

भारत की विदेश नीति हमेशा से संतुलन बनाकर चलने में रही है। अगर हम पूरी तरह अमेरिकी दबाव में आकर फैसले लेने लगे, तो हमारी रणनीतिक स्वतंत्रता पर सवाल उठेंगे। याद रखिए, चीन ने भी वेनेज़ुएला से दूरी बना ली है—ये भी एक संकेत है।

तो फिर क्या करे भारत?

देखिए, वेनेज़ुएला से तेल खरीदना भारत के लिए एक अच्छा मौका हो सकता है—अपना अटका हुआ पैसा निकालने का, और तेल के स्रोतों को विविध बनाने का। लेकिन ये कोई ऐसा सौदा नहीं है जिसमें आंख बंद करके कूद जाना चाहिए।

भारत को चाहिए कि वो अमेरिका, रूस और दूसरे विकल्पों के बीच एक स्मार्ट बैलेंस बनाए। अगर हम समझदारी से चलें, तो ये डील हमारी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकती है और लैटिन अमेरिका में भारत की पकड़ भी बढ़ा सकती है।

बस एक बात याद रखनी है—फैसला दबाव में नहीं, बल्कि अपने हित और समझदारी से लेना है। क्योंकि आखिर में, खेल तो लंबा चलना है!

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TAGGED: Crude Oil Diplomacy, Energy Geopolitics, Global Oil Politics, India Oil Import Strategy, Indian Energy Security, International Energy News, Modi Venezuela Talks, ONGC Videsh Venezuela, Reliance Jamnagar Refinery, Russia Oil Factor, Strategic Autonomy India, Trump tariff threat, US Pressure on India, Venezuela Oil Deal, भारत तेल नीति
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