नई दिल्ली: फिल्म ‘हनुमान अंश’ का गाना ‘जब जिद पर आ गईं पार्वती, समझाने आए सप्तऋषि’ इन दिनों लोगों के बीच चर्चा में है। बुंदेली भाषा में तैयार इस गाने ने भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी उस कथा को फिर से लोगों के बीच ला दिया है, जिसमें माता पार्वती भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या करती हैं। उनकी भक्ति और दृढ़ संकल्प की परीक्षा लेने के लिए सप्तऋषियों को उनके पास भेजा जाता है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर ये सप्तऋषि कौन थे और हिंदू परंपरा में उन्हें इतना महत्वपूर्ण स्थान क्यों मिला है?
सप्तऋषि यानी सात महान ऋषि। हिंदू परंपरा में उन्हें वैदिक ज्ञान, तप, धर्म और मानव समाज के मार्गदर्शन का प्रतीक माना जाता है। अलग-अलग ग्रंथों और अलग-अलग मन्वंतर में सप्तऋषियों की सूची अलग मिलती है। वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों, महाभारत और विभिन्न पुराणों में इनका उल्लेख मिलता है।
कई परंपराओं में सप्तऋषियों को प्रमुख गोत्रों का प्रवर्तक भी माना गया है। यही वजह है कि भारतीय धार्मिक और वैदिक परंपरा में सप्तऋषियों का स्थान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
1. महर्षि वशिष्ठ
महर्षि वशिष्ठ को राजा दशरथ का कुलगुरु माना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न ने उनके मार्गदर्शन में शिक्षा प्राप्त की थी। वशिष्ठ और विश्वामित्र से जुड़ा कामधेनु गाय का प्रसंग भी प्रसिद्ध है, जिसमें दोनों ऋषियों के बीच संघर्ष हुआ था।
2. महर्षि कश्यप
महर्षि कश्यप को ब्रह्मा के मानस पुत्र मरीचि का पुत्र माना जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार कश्यप ऋषि के वंश से सृष्टि के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका जुड़ी है। उनकी कई पत्नियों का उल्लेख मिलता है। इनमें अदिति से देवताओं और दिति से दैत्यों की उत्पत्ति मानी गई है।
3. महर्षि अत्रि
महर्षि अत्रि को ब्रह्मा के पुत्रों में से एक माना जाता है। उनकी पत्नी अनुसूया थीं। धार्मिक परंपराओं में ऋषि अत्रि को ज्ञान और तप के लिए विशेष सम्मान प्राप्त है। कृषि और समाज के विकास से जुड़ी परंपराओं में भी उनके योगदान का उल्लेख मिलता है।
4. महर्षि जमदग्नि
महर्षि जमदग्नि भगवान परशुराम के पिता थे। उनके आश्रम से जुड़ी कामधेनु गाय की कथा भी काफी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि कार्तवीर्य अर्जुन इस गाय को अपने साथ ले गया था, जिसके बाद संघर्ष की स्थिति पैदा हुई।
5. महर्षि गौतम
महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या थीं। रामायण की कथा में अहिल्या को मिले श्राप और भगवान श्रीराम द्वारा उन्हें पुनः मानव रूप मिलने का प्रसंग प्रसिद्ध है। गौतम ऋषि की तपस्या और उनसे जुड़ी धार्मिक कथाओं का उल्लेख कई ग्रंथों में मिलता है।
6. महर्षि विश्वामित्र
विश्वामित्र का जीवन एक राजा से ऋषि बनने की कथा से जुड़ा है। उनकी कठोर तपस्या, मेनका का प्रसंग और गायत्री मंत्र से जुड़ी परंपरा उन्हें विशेष रूप से प्रसिद्ध बनाती है। रामायण की कथा में भी विश्वामित्र की महत्वपूर्ण भूमिका है।
7. महर्षि भारद्वाज
महर्षि भारद्वाज का उल्लेख वैदिक और धार्मिक परंपरा में प्रमुख ऋषि के रूप में मिलता है। उनसे आयुर्वेद और विभिन्न ग्रंथों की परंपरा जुड़ी हुई है। महाभारत की परंपरा में द्रोणाचार्य को उनका पुत्र माना गया है।
सप्तऋषियों की अवधारणा की जड़ें वैदिक साहित्य में मानी जाती हैं। ऋग्वेद में कई ऋषि कुलों और ऋषियों का उल्लेख मिलता है। सप्तऋषियों की प्राचीन स्पष्ट सूचियों में जैमिनीय ब्राह्मण का नाम लिया जाता है। इसके अलावा शतपथ ब्राह्मण और बृहदारण्यक उपनिषद में भी सप्तऋषियों का वर्णन मिलता है।
वैदिक परंपरा में ऋषियों को मंत्रों का ‘द्रष्टा’ यानी ज्ञान या मंत्र का अनुभव करने वाला माना गया है। इसी वैदिक परंपरा से सप्तऋषियों की अवधारणा जुड़ी हुई मानी जाती है।
पुराणों में वर्णन मिलता है कि ब्रह्मा ने सृष्टि के विस्तार के लिए अपने मन से कुछ पुत्रों को उत्पन्न किया। इन्हें मानस पुत्र कहा गया। धार्मिक मान्यताओं में इन्हीं मानस पुत्रों को ज्ञान, धर्म, योग, ज्योतिष और सृष्टि के विस्तार से जुड़ी महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है।
कई परंपराओं में सप्तऋषियों को मानव सभ्यता के प्रारंभिक गुरुओं और गोत्रों के प्रवर्तकों के रूप में भी देखा जाता है।
फिल्म ‘हनुमान अंश’ का गाना ‘जब जिद पर आ गईं पार्वती’ इसी कथा से प्रेरित बताया गया है। शिव पुराण और रामचरितमानस में भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह से जुड़ा प्रसंग मिलता है।
कथा के अनुसार, माता पार्वती भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या कर रही थीं। उनकी भक्ति और संकल्प की परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव ने सप्तऋषियों को उनके पास भेजा। सप्तऋषियों ने माता पार्वती को शिव के स्वरूप, वेशभूषा और उनके जीवन से जुड़ी बातों का हवाला देते हुए समझाने की कोशिश की कि उन्हें अपनी तपस्या छोड़ देनी चाहिए।
लेकिन माता पार्वती अपने निर्णय से नहीं डिगीं। सप्तऋषियों की बातों का भी उनके संकल्प पर कोई असर नहीं हुआ और उन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए अपनी तपस्या जारी रखी।
कथा में आगे भगवान शिव के स्वयं ब्रह्मचारी का रूप धारण कर माता पार्वती के पास जाने का प्रसंग भी आता है। उन्होंने भी शिव के बारे में नकारात्मक बातें कहकर पार्वती को अपने निर्णय से पीछे हटाने की कोशिश की। लेकिन पार्वती ने शिव के प्रति अपनी भक्ति और विश्वास से समझौता नहीं किया।
माता पार्वती की इसी अटूट भक्ति और दृढ़ संकल्प के बाद भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। यही वजह है कि ‘सप्तऋषि’ का जिक्र इस कथा में सिर्फ सात ऋषियों के नाम के तौर पर नहीं, बल्कि माता पार्वती की दृढ़ भक्ति और परीक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रसंग के रूप में होता है।
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