पश्चिम बंगाल की राजनीति का तिलिस्म हर दिन अपना रंग बदल रहा है। ममता बनर्जी को राज्य की सत्ता से बेदखल करने की लाख कोशिश के बाद भी बीजेपी को अभी तक सफलता नहीं मिली है। लेकिन अब बीजेपी के हाथ एक ऐसा मोहरा लगा है जिसने बीजेपी की उम्मीदों को बढ़ा दिया है। बात हो रही है कभी ममता बनर्जी के खास रहे हुमायूं कबीर की, जो आज ममता बनर्जी को सत्ता से हटाने का ऐलान कर रहे हैं। चर्चाओं का बाजार गर्म है कि हुमायूं कबीर को पर्दे के पीछे से बीजेपी कंट्रोल कर रही है।
ममता से बगावत और ‘बी टीम’ के आरोप
दरअसल ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत मुस्लिम वोटबैंक को माना जाता है और बीजेपी कबीर के जरिए ममता से उस वोटबैंक को तोड़ना चाहती है। तो क्या ममता बनर्जी से बगावत कर हुमायूं कबीर अब बीजेपी की बी टीम बन चुके हैं जैसा असदुद्दीन ओवैसी के बारे में कहा जाता रहा है। आपको याद होगा कि विपक्षी दल बिहार के चुनाव में ओवैसी पर बीजेपी की बी टीम होने का आरोप लगाते थे। उनका कहना था कि ओवैसी राज्य में चुनाव लड़ मुस्लिम मतों में बंटवारा करते हैं जिससे बीजेपी को फायदा होता है। तो क्या हुमायूं कबीर बंगाल के ओवैसी बनने की राह पर हैं। ऐसे आरोप क्यों लग रहे हैं हम आपको एक एक करके बताएंगे।
नई पार्टी और मुस्लिम वोटों का नया समीकरण
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं, राज्य की राजनीति में ध्रुवीकरण और तेज़ होता जा रहा है। इसी माहौल में टीएमसी से निष्कासित नेता हुमायूं कबीर की राजनीति चर्चा के केंद्र में है। बाबरी मस्जिद से जुड़े एक विवाद के बाद सुर्खियों में आए हुमायूं कबीर ने अपनी नई पार्टी जनता उन्नयन पार्टी के गठन का ऐलान कर बंगाल की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है।
6 दिसंबर को मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में नई बाबरी मस्जिद की नींव रखने के बाद हुमायूं कबीर विवादों में घिर गए। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें टीएमसी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद हुमायूं कबीर ने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने का फैसला किया और रेजीनगर में बड़ी सभा के जरिए नई पार्टी की घोषणा करने की तैयारी की। उनका दावा है कि उनकी राजनीति का केंद्र विकास होगा, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे मुस्लिम वोटों के नए ध्रुवीकरण की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं।
मुस्लिम वोटों की राजनीति
मुर्शिदाबाद, जहां 70 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी है, हुमायूं कबीर की राजनीति का मुख्य केंद्र बन गया है। वे खुद को मुस्लिम समाज के एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। हुमायूं कबीर का दावा है कि उनकी पार्टी बंगाल की सभी 294 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और बीजेपी, टीएमसी के साथ-साथ कांग्रेस, सीपीआईएम और ओवैसी की पार्टी के साथ गठबंधन के विकल्प भी खुले रखेगी।
बंगाल में करीब 30 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं, जो लगभग 100 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं और लंबे समय से टीएमसी का कोर वोट बैंक रहे हैं। हुमायूं कबीर की एंट्री इस वोट बैंक में सेंध लगा सकती है, जिसका सीधा नुकसान ममता बनर्जी को हो सकता है। फिलहाल यह साफ है कि हुमायूं कबीर ने बंगाल की राजनीति में एक नया समीकरण खड़ा कर दिया है, जो आने वाले चुनाव को और दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण बना सकता है।