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हूतियों ने यमन से लाल सागर तक कैसे बढ़ाया अपना असर? कौन हैं ये विद्रोही, सऊदी अरब से क्यों छिड़ी जंग और ईरान से क्या है कनेक्शन?

सना: यमन के हूती विद्रोही एक बार फिर क्षेत्रीय संघर्ष के केंद्र में हैं। कभी उत्तरी यमन के पहाड़ी इलाके तक सीमित रहने वाला यह संगठन आज यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखता है और लाल सागर के अहम समुद्री रास्ते तक उसकी गतिविधियां पहुंच चुकी हैं। सऊदी अरब के साथ लंबे समय से चला आ रहा संघर्ष और ईरान के साथ उसके संबंध इस पूरे विवाद को और ज्यादा महत्वपूर्ण बना देते हैं।

हूतियों को समझने के लिए यमन के इतिहास, वहां के धार्मिक-सामाजिक समीकरण और अरब प्रायद्वीप की भौगोलिक स्थिति को समझना जरूरी है। आखिर ये संगठन बना कैसे, इसका नाम हूती क्यों पड़ा, सऊदी अरब से इसकी दुश्मनी की शुरुआत कहां से हुई और लाल सागर इस संघर्ष का अहम मैदान कैसे बन गया?

सबसे पहले समझिए अरब प्रायद्वीप और यमन की भौगोलिक स्थिति

अरब प्रायद्वीप तीन तरफ से समुद्र से घिरा विशाल इलाका है। इसके पश्चिम में लाल सागर है, जिसके दूसरी तरफ अफ्रीका है। दक्षिण में अदन की खाड़ी और अरब सागर हैं, जबकि पूर्व में फारस की खाड़ी है। फारस की खाड़ी के दूसरी तरफ ईरान स्थित है।

आज इस इलाके में कई अलग-अलग देश हैं, लेकिन आधुनिक सीमाएं अपेक्षाकृत नई हैं। पिछली सदी से पहले अरब प्रायद्वीप के बड़े हिस्से में अलग-अलग कबीलाई इलाकों का प्रभाव था और आज की तरह स्पष्ट राष्ट्रीय सीमाएं नहीं थीं।

इसी अरब प्रायद्वीप के दक्षिणी हिस्से में यमन है। यमन के उत्तरी हिस्से में सादा का पहाड़ी इलाका है, जहां लंबे समय तक जैदी शिया समुदाय का प्रभाव रहा।

यमन के उत्तर में लंबे समय तक जैदी इमामों का शासन रहा

जैदी शिया शिया समुदाय की एक शाखा हैं। उत्तरी यमन के सादा क्षेत्र में जैदी शिया इमामों का शासन करीब एक हजार साल तक रहा। पहाड़ी भौगोलिक स्थिति के कारण यह इलाका अरब प्रायद्वीप के दूसरे हिस्सों से काफी अलग रहा।

वहीं यमन के दक्षिणी हिस्से में ब्रिटेन का प्रभाव बढ़ा। ब्रिटेन के लिए अदन का बंदरगाह बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि समुद्री रास्ते से भारत जाने वाले मार्ग में इसका रणनीतिक महत्व था। इसलिए दक्षिणी यमन का बड़ा हिस्सा ब्रिटिश नियंत्रण में रहा, जबकि उत्तर में जैदी इमामों का प्रभाव बना रहा।

इसी दौरान अरब प्रायद्वीप के उत्तर में सऊद परिवार का प्रभाव बढ़ा और 1932 में सऊदी अरब का गठन हुआ।

1962 के तख्तापलट से बदला यमन का राजनीतिक नक्शा

1962 में उत्तरी यमन में जैदी इमामों के शासन के खिलाफ सेना ने तख्तापलट कर दिया। इसके बाद उत्तरी यमन एक गणतंत्र बना। दूसरी ओर दक्षिणी यमन अलग राजनीतिक व्यवस्था के तहत आगे बढ़ता रहा।

आखिरकार 1990 में उत्तरी और दक्षिणी यमन का एकीकरण हुआ और आज का यमन अस्तित्व में आया। सना को राजधानी बनाया गया। नए यमन में सुन्नी राजनीतिक ताकतों का प्रभाव बढ़ा और सऊदी अरब का असर भी मजबूत हुआ।

लेकिन उत्तरी पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों के बीच यह धारणा बढ़ती गई कि उनके क्षेत्र को विकास के मामले में पीछे छोड़ दिया गया है। सादा जैसे इलाकों में गरीबी और पिछड़ापन बना रहा। यही माहौल आगे चलकर विद्रोह की जमीन बना।

हुसैन अल-हूती ने युवाओं को जोड़ा, यहीं से शुरू हुई कहानी

1990 के दशक में हुसैन अल-हूती ने जैदी शिया युवाओं के बीच एक आंदोलन शुरू किया। उनका जोर जैदी पहचान और राजनीतिक अधिकारों पर था। धीरे-धीरे यह आंदोलन धार्मिक-सामाजिक गतिविधि से आगे बढ़कर राजनीतिक स्वरूप लेने लगा।

हुसैन अल-हूती के नाम से ही इस आंदोलन से जुड़े लड़ाकों को हूती कहा जाने लगा। हालांकि सभी हूती लड़ाके एक ही कबीले से नहीं आते थे। संगठन खुद को अंसार अल्लाह के नाम से भी संबोधित करता है।

हूती आंदोलन ने तत्कालीन राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह की सरकार का विरोध किया। अमेरिका और इजरायल के खिलाफ उसके विरोध ने भी उसे अलग पहचान दी।

2004 में सरकार से सीधी लड़ाई शुरू हुई

2004 में यमन की सरकार ने हुसैन अल-हूती को गिरफ्तार करने की कोशिश की। इसके बाद सादा क्षेत्र में सरकार और हूती लड़ाकों के बीच संघर्ष शुरू हो गया।

हूती लड़ाके पहाड़ी इलाकों की भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाते हुए गुरिल्ला तरीके से लड़ते थे। घात लगाकर हमले, स्नाइपर और बारूदी सुरंग जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया गया। यमन की सेना के लिए पहाड़ी इलाकों में इस तरह के संघर्ष से निपटना चुनौतीपूर्ण साबित हुआ।

धीरे-धीरे हूतियों का प्रभाव उत्तरी यमन में बढ़ता गया।

2011 के बाद अराजकता बढ़ी, 2014 में सना पर कब्जा

2011 के बाद यमन में राजनीतिक अस्थिरता और अराजकता बढ़ी। राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह को सत्ता छोड़नी पड़ी। इसी अस्थिरता के बीच हूती संगठन और मजबूत होता गया।

2014 में हूती लड़ाकों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया। इसके बाद देश का संघर्ष एक नए चरण में पहुंच गया।

सऊदी अरब को अपने दक्षिणी सीमा क्षेत्र के पास ईरान समर्थित ताकत के मजबूत होने का खतरा महसूस हुआ। इसके बाद 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया।

सऊदी अरब और हूतियों की लड़ाई सिर्फ यमन तक क्यों नहीं रही?

यमन की लड़ाई धीरे-धीरे उसकी सीमाओं से बाहर निकलने लगी। सऊदी अरब और हूतियों के बीच मिसाइल और ड्रोन हमलों का सिलसिला भी इस संघर्ष का हिस्सा बना।

हूतियों और ईरान के संबंधों ने इस संघर्ष को क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन से जोड़ दिया। हालांकि जैदी शिया परंपराएं ईरान में प्रचलित शिया परंपराओं से पूरी तरह समान नहीं हैं, लेकिन ईरान पर हूतियों को समर्थन देने के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं।

यही वजह है कि यमन का संघर्ष सिर्फ वहां की सत्ता के लिए लड़ाई नहीं रह गया, बल्कि सऊदी अरब और ईरान के बीच क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता से भी जुड़ गया।

लाल सागर कैसे बना हूती संघर्ष का नया मोर्चा?

यमन की भौगोलिक स्थिति इस संघर्ष को बेहद महत्वपूर्ण बना देती है। यमन के पश्चिम में लाल सागर है और इसके दक्षिणी हिस्से में बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य है। यह समुद्री रास्ता वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है।

हूतियों की गतिविधियां जब लाल सागर तक पहुंचीं तो संघर्ष का असर यमन की सीमा से कहीं आगे दिखाई देने लगा। समुद्री मार्ग पर तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही और क्षेत्रीय व्यापार पर भी चिंता बढ़ी।

यही कारण है कि हूतियों से जुड़ा कोई भी बड़ा घटनाक्रम केवल यमन या सऊदी अरब की खबर नहीं रह जाता।

आज हूतियों का यमन में कितना नियंत्रण है?

हूती संगठन उत्तर और पश्चिमी यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखता है और खुद को देश की वैध सत्ता के रूप में पेश करता है। दूसरी ओर यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार हूतियों को विद्रोही संगठन मानती है।

इस तरह यमन में सत्ता और नियंत्रण को लेकर संघर्ष अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। एक तरफ हूती नियंत्रित क्षेत्र हैं, तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार और उससे जुड़े दूसरे गुट हैं।

ईरान, सऊदी अरब और लाल सागर से आगे क्यों बढ़ सकता है असर?

हूती संघर्ष को केवल यमन का घरेलू विवाद मानना अब मुश्किल है। इसकी वजह है यमन की रणनीतिक स्थिति, लाल सागर का समुद्री मार्ग और सऊदी अरब तथा ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा क्षेत्रीय तनाव।

अगर लाल सागर और बाब अल-मंदेब के आसपास तनाव बढ़ता है तो इसका असर समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और दूसरे देशों के लिए माल ढुलाई के रास्तों पर पड़ सकता है। यही वजह है कि हूतियों से जुड़ा कोई भी नया संघर्ष पूरे पश्चिम एशिया के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भी चिंता बढ़ाता है।

सौ बात की एक बात यह है कि हूती आंदोलन की जड़ें यमन के उत्तरी पहाड़ी इलाकों की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में हैं, लेकिन समय के साथ यह संघर्ष सऊदी अरब, ईरान और लाल सागर की रणनीतिक राजनीति से जुड़ गया। यही बदलाव हूतियों को आज क्षेत्रीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष बनाता है।

vineet verma

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