ईरान को खत्म करने की बात करने वाले अमेरिका और इजरायल अब खुद इस युद्ध में भारी दबाव झेलते नजर आ रहे हैं। अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह दावा कर रहे हैं कि ईरान पूरी तरह तबाह हो चुका है और उसका सैन्य ढांचा नष्ट कर दिया गया है। हालांकि जमीनी हालात कुछ और ही संकेत दे रहे हैं, क्योंकि ईरान की ओर से लगातार पलटवार किए जा रहे हैं, जिससे तनाव और बढ़ गया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बंद, दुनिया में ऊर्जा संकट की आशंका
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने का कदम उठाया। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल शिपिंग रूट्स में से एक है। इसके बंद होने से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है। अब अमेरिका इस समुद्री मार्ग को दोबारा खुलवाने के लिए दूसरे देशों से सहयोग मांग रहा है।
अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले का दावा
ईरान ने दावा किया है कि उसकी मिसाइलों ने अरब देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। भले ही ईरानी मिसाइलें सीधे अमेरिका तक नहीं पहुंच सकतीं, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर हमले से उसकी रणनीतिक स्थिति पर दबाव बढ़ा है। कुछ रिपोर्टों में अमेरिकी और इजरायली सैनिकों के हताहत होने की भी बात कही गई है।
खार्ग द्वीप पर अमेरिका की जवाबी कार्रवाई
दूसरी ओर अमेरिका ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए फारस की खाड़ी में स्थित ईरान के खार्ग द्वीप पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए हैं। इस हमले में तेल टर्मिनल, सैन्य ठिकानों और एयर डिफेंस सिस्टम को निशाना बनाया गया। खार्ग द्वीप से ईरान के लगभग 90 प्रतिशत तेल का निर्यात होता है, इसलिए इस हमले को बेहद अहम माना जा रहा है।
हॉर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा पर अंतरराष्ट्रीय हलचल
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच हॉर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा को लेकर वैश्विक हलचल भी तेज हो गई है। जापान की प्रधानमंत्री सना ताकाइची ने संसद में कहा कि टोक्यो फिलहाल वहां से गुजरने वाले तेल टैंकरों की सुरक्षा के लिए अपनी नौसेना भेजने की योजना नहीं बना रहा है और इस पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
चीन और NATO पर ट्रंप का दबाव
डोनाल्ड ट्रंप ने चीन से भी इस समुद्री मार्ग की सुरक्षा में मदद करने की अपील की है। उनका कहना है कि चीन को इस रास्ते से लगभग 90 प्रतिशत तेल की आपूर्ति होती है, इसलिए उसे जिम्मेदारी निभानी चाहिए। ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर चीन सहयोग नहीं करता तो वह राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रस्तावित शिखर वार्ता को टाल सकते हैं।
साथ ही उन्होंने NATO देशों को भी चेतावनी दी कि यदि वे अमेरिका की मदद नहीं करते, तो इसका असर गठबंधन के भविष्य पर पड़ सकता है।
युद्ध का बढ़ता आर्थिक बोझ
इस युद्ध की आर्थिक कीमत भी तेजी से बढ़ रही है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के साथ संघर्ष के पहले छह दिनों में ही अमेरिका लगभग 11.3 अरब डॉलर खर्च कर चुका है। दो दिनों में करीब 5.6 अरब डॉलर खर्च होने की बात भी सामने आई थी। इसी अनुमान के आधार पर 13 दिनों में कुल खर्च करीब 26 अरब डॉलर तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।
इन हालात के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या ईरान के साथ टकराव अमेरिका के लिए रणनीतिक जाल बनता जा रहा है। एक ओर ट्रंप ईरान को कमजोर बताकर जीत का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर लगातार पलटवार, होर्मुज संकट और बढ़ता युद्ध खर्च यह दिखा रहा है कि यह संघर्ष अमेरिका के लिए आसान नहीं है। ऐसे में कई विश्लेषक मान रहे हैं कि ईरान के साथ यह जंग ट्रंप की रणनीति के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है और अब यह सवाल उठ रहा है कि कहीं ट्रंप इस युद्ध में खुद ही तो नहीं फंस गए हैं।
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