यमन के सुलगते रेगिस्तान से उठी एक ऐसी आग, जिसने पूरी दुनिया की धड़कनों को तेज कर दिया है! लाल सागर के पानी से लेकर आसमान तक मंडराते ड्रोन और मिसाइलों के साये ने एक बार फिर मध्य पूर्व में खलबली मचा दी है। 15 सितंबर को सऊदी अरब के तीन प्रमुख शहरों पर हुए भीषण हमलों में 13 लोगों के घायल होने के बाद से क्षेत्रीय तनाव अपने चरम पर है। आखिर कौन हैं ये हूती विद्रोही, जिनकी दुस्साहसिक चालों ने दुनिया के सबसे ताकतवर देशों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है? ईरान से इनका कितना गहरा कनेक्शन और क्या है इनका असली मकसद? आइए जानते हैं इस महातनाव के पीछे की पूरी और हैरान करने वाली कहानी!
हूती यमन के ज़ैदी शिया समुदाय से निकला एक सशस्त्र राजनीतिक-सैन्य आंदोलन है, जिसे अंसार अल्ला के नाम से भी जाना जाता है। इसकी शुरुआत 1990 के दशक में हुसैन बद्र अल-दीन अल-हूती के नेतृत्व में हुई।
आंदोलन ने शुरुआत में ज़ैदी समुदाय की पहचान और राजनीतिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों को उठाया। 2014 में हूतियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया, जिसके बाद यमन का संघर्ष व्यापक क्षेत्रीय टकराव में बदल गया।
आज हूती यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के सत्ता-संघर्ष के प्रमुख पक्षों में शामिल हैं। अक्टूबर 2023 के बाद गाजा युद्ध के दौरान लाल सागर क्षेत्र में जहाजों पर हूती हमलों ने उन्हें वैश्विक सुर्खियों में ला दिया। उनका दावा रहा है कि ये कार्रवाई फिलिस्तीनियों के समर्थन में की जा रही है।
हूतियों के शुरुआती आंदोलन का केंद्र ज़ैदी समुदाय के अधिकार और यमन की घरेलू राजनीति थी। समय के साथ उनका एजेंडा क्षेत्रीय राजनीति तक फैल गया। हूती सऊदी अरब और अन्य विदेशी शक्तियों के यमन में हस्तक्षेप का विरोध करते हैं और देश में अपने राजनीतिक व सैन्य प्रभाव को बनाए रखना चाहते हैं।
अमेरिका और इजराइल का विरोध भी हूती विचारधारा का प्रमुख हिस्सा है। गाजा युद्ध के बाद लाल सागर और बाब-अल-मंदेब क्षेत्र में उनकी गतिविधियों ने इस विरोध को अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों तक पहुंचा दिया।
हूती संगठन को ईरान के समर्थन वाले क्षेत्रीय नेटवर्क ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ का हिस्सा माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र की विशेषज्ञ रिपोर्टों में कहा गया है कि हूतियों की कई जटिल हथियार प्रणालियों के विकास और इस्तेमाल के लिए विदेशी समर्थन महत्वपूर्ण रहा है। रिपोर्ट में मिसाइल, ड्रोन और अन्य सैन्य प्रणालियों से जुड़ी बाहरी सहायता के प्रमाणों का उल्लेख किया गया है।
हूतियों के संबंध ईरान-समर्थित क्षेत्रीय समूहों से भी बताए जाते हैं। हालांकि, हूतियों को केवल किसी दूसरे देश के ‘कठपुतली संगठन’ के तौर पर देखना पूरे मामले को सरल बना सकता है, क्योंकि संगठन के अपने स्थानीय राजनीतिक और सैन्य हित भी हैं।
सऊदी अरब और हूतियों के बीच बढ़ता तनाव सिर्फ यमन तक सीमित नहीं है। बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य दुनिया के अहम समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है। ऐसे में इस क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ने का असर समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा पर पड़ सकता है।
हूतियों और सऊदी अरब के बीच बढ़ता टकराव यमन के पुराने संघर्ष को एक बार फिर क्षेत्रीय संकट में बदलता दिख रहा है। हूती अपनी सैन्य ताकत और रणनीतिक स्थिति के जरिए दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि ईरान से उनके संबंध इस संघर्ष को व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ देते हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह तनाव यमन और लाल सागर तक सीमित रहता है या पश्चिम एशिया में इसका असर और दूर तक दिखाई देता है।
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