दिसंबर 2025 में, जब जापान के निगाटा प्रांत में काशिवाज़ाकी-कारीवा—दुनिया के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्र—को दोबारा शुरू करने की प्रक्रिया को हरी झंडी मिली, तो यह फैसला सिर्फ ऊर्जा नीति का नहीं था, बल्कि स्मृतियों का भी था। लगभग 15 साल बाद, वही कंपनी TEPCO, जिसके नाम के साथ फुकुशिमा की सबसे भयावह यादें जुड़ी हैं, फिर से रिएक्टर चलाने जा रही है। सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा और बढ़ती बिजली जरूरतों से जोड़ रही है, लेकिन सड़कों पर ‘No Nukes’ के नारे गूंज रहे हैं। यह वही जापान है, जो आज भी एक सवाल से पीछा नहीं छुड़ा पाया है—अगर फिर कुछ हुआ, तो क्या हम तैयार हैं? इसी सवाल का जवाब हमें 11 मार्च 2011 की उस दोपहर में ले जाता है, जब फुकुशिमा में 50 लोग जानते-बूझते मौत के करीब गए थे, ताकि देश बच सके।
कल्पना कीजिए जब धरती लगातार तीन मिनट तक कांप रही हो। समंदर एक दीवार बनकर आपकी तरफ बढ़ रहा हो। और आप जानते हों कि अगले कुछ घंटों में लिया गया एक फैसला तय करेगा कि आपका देश बचेगा या रेडियोएक्टिव इतिहास बन जाएगा। यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं था। यह 11 मार्च 2011 की दोपहर 2 बजकर 46 मिनट का जापान था।
उस दिन 56 साल के मसाओ योशिदा ने यह नहीं सोचा था कि आने वाले घंटे उन्हें सिर्फ एक प्लांट मैनेजर नहीं, बल्कि इतिहास का निर्णायक बना देंगे। उन्हें यह तय करना था कि नियम बचाए जाएं या लोग। आदेश माने जाएं या देश।
जब धरती हिली और सिस्टम टूट गया
Honshu द्वीप के पूर्वी तट से 130 किलोमीटर दूर समुद्र के नीचे 9.0 तीव्रता का भूकंप आया—जापान के इतिहास का सबसे शक्तिशाली भूकंप। यह कोई सामान्य झटका नहीं था। समुद्र तल सैकड़ों किलोमीटर तक हिल गया। जापान का भूगोल तक कुछ मीटर खिसक गया।
करीब 50 मिनट बाद सुनामी आई—कुछ जगहों पर 10 से 15 मीटर ऊंची लहरें। Sendai का एयरपोर्ट डूब गया, नदियां उफन पड़ीं, और देखते ही देखते सैकड़ों वर्ग किलोमीटर इलाका पानी में समा गया। लगभग 19,500 लोग मारे गए या लापता हो गए। लाखों बेघर हो गए।
लेकिन असली खतरा अभी सामने आना बाकी था।
फुकुशिमा: जहां तकनीक हार गई, इंसान खड़ा रहा
Fukushima Daiichi Nuclear Power Plant छह रिएक्टरों वाला यह प्लांट भूकंप के बाद डिजाइन के मुताबिक बंद हो गया। शुरुआत में सब कुछ “कंट्रोल” में था। डीज़ल जनरेटर चालू हो गए। लेकिन 3:37 बजे शाम को हालात पलट गए।
सुनामी की ऊंचाई प्लांट की 5.7 मीटर ऊंची सी-वॉल से कहीं ज्यादा थी। पानी बेसमेंट में घुसा, 13 में से 12 इमरजेंसी जनरेटर डूब गए। बैटरियां भी जवाब दे गईं। बिजली चली गई। कूलिंग सिस्टम बंद हो गया।
न्यूक्लियर रिएक्टर बंद होने के बाद भी ठंडा करना जरूरी होता है। लेकिन यहां अंधेरा था, उपकरण बंद थे, और किसी को ठीक-ठीक पता नहीं था कि अंदर क्या हो रहा है। मेल्टडाउन शुरू हो चुका था। बिना किसी चेतावनी के।
पहला विस्फोट और दुनिया की नजरें
12 मार्च की सुबह प्रधानमंत्री नाओतो कान खुद साइट पर पहुंचे। सवाल हुआ—वाल्व क्यों नहीं खोले जा रहे? जवाब सीधा था: बिजली नहीं है और रेडिएशन इतना ज्यादा कि इंसानों को भेजना मौत को बुलाना है।
फिर भी लोग गए। हाथों से वाल्व खोले गए। दोपहर 3:36 बजे Unit-1 में हाइड्रोजन विस्फोट हुआ। छत उड़ गई। रेडियोएक्टिव कण हवा में फैल गए। दुनिया ने यह दृश्य लाइव देखा।
इसके बाद 14 और 15 मार्च को और विस्फोट हुए। हालात इतने खराब हो गए कि प्लांट खाली कराने का फैसला लेना पड़ा।
“फुकुशिमा 50”: जो जानते थे, लौटकर नहीं आएंगे
650 कर्मचारियों में से ज्यादातर को हटाया गया। सिर्फ 50–70 लोग रुके। मीडिया ने उन्हें “Fukushima 50” कहा। वे जानते थे कि शायद वे जिंदा नहीं लौटेंगे। फिर भी वे रुके—क्योंकि अगर वे नहीं रुकते, तो जापान का नक्शा बदल सकता था।
यह कोई वीरता का प्रदर्शन नहीं था। यह कर्तव्य था—जैसा वे खुद कहते हैं।
वो चेतावनियां, जिन्हें नजरअंदाज किया गया
सच यह है कि यह आपदा पूरी तरह “प्राकृतिक” नहीं थी। 2008 में ही चेतावनी मिल चुकी थी कि यहां 15 मीटर तक की सुनामी आ सकती है। लेकिन उसे “अवास्तविक” कहकर टाल दिया गया।
सरकार, रेगुलेटर और कंपनी—तीनों ने खतरे को कम करके आंका। बाद में जापानी संसद की जांच समिति ने साफ कहा: यह “man-made disaster” था।
मसाओ योशिदा का वो फैसला, जिसने सब बदल दिया
12 मार्च की शाम आदेश आया—समुद्री पानी डालकर रिएक्टर ठंडा करो। फिर अचानक हेडक्वार्टर से दूसरा आदेश आया—इंजेक्शन रोक दो। वजह? रिएक्टर स्थायी रूप से खराब हो जाएंगे।
योशिदा ने कैमरे के सामने आदेश मानने का नाटक किया। लेकिन ग्राउंड पर पंपिंग कभी नहीं रुकी।
उन्होंने नियम तोड़े—और देश को बचा लिया।
जांच रिपोर्ट ने बाद में कहा: अगर योशिदा ने आदेश न तोड़ा होता, तो हालात कहीं ज्यादा भयावह होते।
कीमत, जो उन्होंने चुकाई
कुछ महीनों बाद योशिदा को कैंसर हुआ। स्ट्रोक आया। 9 जुलाई 2013 को 58 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। वे कभी खुद को हीरो नहीं मानते थे।
उनके साथ काम करने वाले कई लोग आज भी कैमरे से बचते हैं। वे कहते हैं – “हमने सिर्फ अपना काम किया।”
आज का जापान और फुकुशिमा का सबक
आज, जब जापान एक बार फिर परमाणु ऊर्जा की ओर लौट रहा है, तो फुकुशिमा सिर्फ एक बीती हुई दुर्घटना नहीं है। यह एक चेतावनी है। काशिवाज़ाकी-कारीवा के बाहर खड़े बुज़ुर्ग प्रदर्शनकारी हों या वे लोग, जिन्होंने 2011 में अपने घर छोड़े—सभी एक ही बात कहते हैं: “फुकुशिमा को भूलना सबसे बड़ा खतरा है।”
फुकुशिमा हमें यही सिखाता है कि तकनीक कभी अचूक नहीं होती। और कभी-कभी, किसी देश को बचाने के लिए एक इंसान को सिस्टम के खिलाफ खड़ा होना पड़ता है -जैसे मसाओ योशिदा और वे 50 लोग, जिन्होंने जान देकर जापान को दूसरा मौका दिया।