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‘बुलडोजर कल्चर से लेकर फ्री स्पीच पर चोट’! जस्टिस एपी शाह ने सत्ता और प्रशासनिक रवैये पर उठाए सवाल

लोकतंत्र सिर्फ चुनावों और राजनीतिक बहसों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह असहमति को स्वीकार करने और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा से तय होता है। इसी बात को रेखांकित करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एपी शाह ने मौजूदा दौर के प्रशासनिक रवैये, बुलडोजर कार्रवाई और अभिव्यक्ति की आजादी की स्थिति पर बेहद बेबाक टिप्पणी की है। गोवा में आयोजित ‘जस्टिस एचआर खन्ना स्मृति व्याख्यान’ के दौरान उन्होंने देश के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक माहौल को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए।

असहमति दबाने के लिए कानूनों का यूज़

जस्टिस शाह का कहना है कि आज सोशल एक्टिविस्ट्स और सरकार से सवाल पूछने वाली आवाज़ों को चुप कराने के लिए सख्त कानूनों और सरकारी तंत्र का इस्तेमाल एक हथियार की तरह हो रहा है। जब युवा या नागरिक सिस्टम की कमियों पर जवाबदेही मांगते हैं, तो संवाद की जगह FIR और लाठीचार्ज से जवाब दिया जाता है। एक हेल्दी डेमोक्रेसी में क्रिटिसिज्म का जवाब बातचीत से होना चाहिए, प्रशासनिक दबाव से नहीं।

मीडिया और क्रिएटिव फ्रीडम पर कसता शिकंजा

फ्री स्पीच पर बात करते हुए उन्होंने मीडिया और स्टैंड-अप कॉमेडियन्स की मौजूदा स्थिति का ज़िक्र करते हुए कहा की “जो मीडिया हाउस बिना किसी डर के सत्ता से सवाल करते हैं, उन्हें टैक्स रेड्स और ऑडिट्स के चक्कर में उलझा दिया जाता है। कॉमेडियन्स और आर्टिस्ट्स के बयानों को आउट ऑफ कॉन्टेक्स्ट ले जाकर कानूनी मामलों में फँसाया जा रहा है। आयोजकों तक को महीनों जेल में रहना पड़ता है। इससे पूरे समाज में एक खौफ और ‘सेल्फ-सेंसरशिप’ का माहौल बन रहा है”।

‘बुलडोजर जस्टिस’ और एनकाउंटर पर सवाल

बिना कोर्ट ट्रायल के सीधे चलाए जा रहे ‘बुलडोजर एक्शन’ को उन्होंने ‘रूल ऑफ लॉ’ के लिए सीधा खतरा बताया। कहा: “आज कार्यपालिका खुद ही इन्वेस्टिगेटर, जज और जल्लाद की भूमिका निभा रही है। बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के किसी का घर गिरा देना आरोपी के साथ-साथ उसके पूरे परिवार को सजा देने जैसा है। अगर सब कुछ सड़क पर ही तय होना है, तो न्यायपालिका और संविधान की ज़रूरत ही क्या बची?”

NEET विवाद और युवाओं की ‘डेमोक्रेटिक एनर्जी’

NEET पेपर लीक के बाद सड़कों पर उतरे छात्रों की तारीफ करते हुए जस्टिस शाह ने इसे ‘लोकतांत्रिक ऊर्जा का पुनरुत्थान’ कहा। जब यह माना जाने लगा था कि लोग सिस्टम के आगे हार मान चुके हैं, तब युवाओं ने शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से आवाज़ उठाकर साबित किया कि देश में डेमोक्रेसी आज भी ज़िंदा है। यह आंदोलन सिर्फ एक परीक्षा का नहीं था, बल्कि पूरे सिस्टम में पारदर्शिता और रिफॉर्म्स की मांग थी।

डिजिटल शटडाउन और जजों के लिए मैसेज

छोटी-छोटी बात पर इंटरनेट बंद कर देने के कल्चर पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि इससे नागरिकों का बेसिक कम्युनिकेशन और सूचना का अधिकार छिन जाता है। जजों को कोई ‘सुपरहीरो’ बनने की ज़रूरत नहीं है। उन्हें बस संविधान, न्याय के सिद्धांतों और कानून के प्रति वफादार रहते हुए, बिना किसी दबाव के निडर फैसले लेने की ज़रूरत है।

news desk

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