दानापुर का 'दंगल'
तारीख थी 30 अप्रैल और साल था 2003 का. बिहार की राजनीति गर्म थी. पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने इसी दिन पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में ‘तेल पिलावन लाठी घुमावन’ रैली का आयोजन किया था. पूरे बिहार से आरजेडी के कार्यकर्ता पटना पहुंच चुके थे. तभी पटना के खगौल इलाके के जमालुद्दीन चक के पास सत्यनारायण सिन्हा की गोली मार कर हत्या कर दी गई. इस हत्या का आरोप स्थानीय रीतलाल यादव के उपर लगा.
बाहुबलियों में शुमार होने वाले रीतलाल यादव धीरे धीरे पटना के दियारा इलाके खासकर दानापुर विधानसभा में अपनी पकड़ मजबूत बनाते गए. 2015 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर एमएलसी बनने वाले रीतलाल यादव बाद में आरजेडी में शामिल हुए और 2020 के विधानसभा चुनाव को जीत कर अपनी पकड़ का एहसास कराया.
आज जब बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव हो रहे हैं तो दानापुर एक बार फिर हॉट सीट बन गई है. इसका कारण सिर्फ रीतलाल यादव ही नहीं बल्कि पांच बार के सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री रामकृपाल यादव भी हैं. अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार रामकृपाल यादव विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं और वो भी दानापुर से. इसलिए दानापुर हैविवेट उम्मीदवारों का दंगल बन गया है.
दानापुर का समीकरण
दानापुर के जीत के आंकड़े बहुत दिलचस्प हैं. यहां 4 बार आरजेडी तो 5 बार बीजेपी को जीत मिल चुकी है. लालू प्रसाद खुद भी 1995 और 2000 में यहां से चुनाव जीत चुके हैं तो 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में रामकृपाल यादव से हार का सामना करने के बाद मीसा भारती 2024 में यहां से सांसद बनीं.
वैसे तो दानापुर में यादव मतदाताओं की संख्या लगभग 22 प्रतिशत सबसे ज्यादा है. वहीं 12 फीसदी एससी और 6.5 फीसदी मुस्लिम भी यहां की सियासत में अहम भूमिका निभाते हैं. लेकिन यहां की सियासत में सबसे बड़ा फर्क ग्रामीण और शहरी हिस्से का है.
बिहार की राजनीति को करीब से समझने वाले राजनीतिक विश्लेषक प्रियदर्शी रंजन के मुताबिक ‘जातीय समीकरण के हिसाब से समझें तो यह क्षेत्र यादव बहुल इलाका है. इसके बाद भी भारतीय जनता पार्टी 5 बार जीत कर इसे अपना गढ़ बना चुकी है. शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में बंटे इस सीट पर यादवों के बाद वैश्य मतदाता सर्वाधिक हैं. इन दो जातियों के बाद शहरी आबादी निर्णायक होती है. शहरी आबादी में सभी जातियों का थोड़ा-थोड़ा अंश है. शहरी आबादी के बूते भाजपा यहां पर राष्ट्रीय जनता दल के ध्रुवीकरण से मुकाबला करती है. असल में इस सीट पर चुनाव का मुकाबला शहरी मतदाता बनाम ग्रामीण मतदाता ही रहता है. पिछले 10 सालों में शहरी आबादी और ज्यादा बढ़ जाने की वजह से भाजपा के लिए सीट सेफ नजर आती है.’
कांटे की टक्कर में किसकी होगी जीत?
2020 में करीब 8 फीसदी के मार्जिन से जीत कर रीतलाल यादव अपनी पकड़ भी दिखा चुके हैं. लेकिन इस बार रीतलाल यादव जेल में हैं. उपर से सत्यनारायण सिन्हा के मर्डर मामले में एमपीएमएलए कोर्ट से बरी होने के बाद उन्हे तब झटका लगा जब सितबंर 2025 में पटना हाईकोर्ट ने निचली अदालत का आदेश रद्द कर मामले को फिर से ओपन कर दिया. विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कोर्ट के ऑर्डर का दानापुर की सियासत पर बड़ा असर महसूस हुआ.
और संभवत: यही कारण है कि बीजेपी ने रामकृपाल यादव जैसे वरिष्ठ नेता को विधानसभा चुनाव में उतारा है. क्योंकि रामकृपाल यादव अगर यादव वोटबैंक में सेंधमारी करने में कामयाब रहे तो बीजेपी इस सीट से वापसी करने में सफल रहेगी. वहीं रीतलाल यादव के बारे में कहा जाता है कि जमीनी स्तर पर उनकी पहुंच और पकड़ बेजोड़ है. कुल मिलाकर दानापुर में एक बेहद रोमांचक मुकाबला देखने को मिल रहा है. जीत किसी की भी हो मामला क्लोज रहेगा.
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