भारत में मोटापा आर्थिक सर्वे
भारत में मोटापा अब सिर्फ फिटनेस या लुक्स से जुड़ा मामला नहीं रह गया है, बल्कि ये एक सीरियस पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी बनता जा रहा है। जो बीमारी कभी अमीर देशों तक सीमित मानी जाती थी, वो अब भारत के हर कोने—शहर हो या गांव, बच्चा हो या बुज़ुर्ग—सबको अपनी चपेट में ले रही है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने इस खतरे की घंटी साफ़-साफ़ बजा दी है। सर्वे का कहना है कि अगर अभी ध्यान नहीं दिया गया, तो मोटापा सिर्फ अस्पतालों का बोझ नहीं बढ़ाएगा, बल्कि देश की मेहनतकश आबादी, प्रोडक्टिविटी और पूरी अर्थव्यवस्था पर असर डालेगा।
29 जनवरी 2026 को संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण में मोटापे को “मेजर पब्लिक हेल्थ चैलेंज” बताया गया है। वजहें भी बिल्कुल सामने हैं—गलत खानपान, घंटों बैठकर काम करना, फिजिकल एक्टिविटी की कमी और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की बढ़ती खपत। हैरानी की बात ये है कि ये दिक्कत अब सिर्फ मेट्रो शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि गांवों में भी तेज़ी से बढ़ रही है।
NFHS-5 के आंकड़े बताते हैं कि करीब 24% महिलाएं और 23% पुरुष ओवरवेट या मोटापे की कैटेगरी में आ चुके हैं। सबसे चिंता की बात बच्चों को लेकर है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में एक्स्ट्रा वेट के मामले तेजी से बढ़े हैं और अनुमान है कि अगर यही ट्रेंड रहा, तो 2035 तक 8 करोड़ से ज्यादा बच्चे मोटापे से जूझ रहे होंगे।
आर्थिक सर्वेक्षण साफ़ कहता है कि मोटापा और उससे जुड़ी बीमारियां भारत के “डेमोग्राफिक डिविडेंड” को कमजोर कर रही हैं। हेल्थ खर्च बढ़ेगा, काम करने की क्षमता घटेगी और इसका सीधा असर ग्रोथ पर पड़ेगा। इसलिए सर्वे में सुझाव दिए गए हैं—जंक फूड पर ज्यादा GST, चेतावनी लेबल, विज्ञापनों पर रोक और प्रिवेंटिव हेल्थकेयर पर जोर।
सरकार POSHAN, फिट इंडिया और ईट राइट इंडिया जैसी योजनाएं चला रही है, लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि बजट 2026 में हेल्थ सेक्टर पर खर्च बढ़ाना अब टालने लायक नहीं है। वरना मोटापा भारत के लिए एक “साइलेंट इमरजेंसी” बन सकता है।
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