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क्या जन्म से अंधे लोग भी देखते हैं सपने? जानिए उनकी दुनिया में रंग नहीं तो आखिर क्या होता है महसूस, रिसर्च ने खोले चौंकाने वाले राज

नई दिल्ली: सपने केवल आंखों से जुड़े अनुभव नहीं होते, बल्कि उनका निर्माण दिमाग करता है। यही वजह है कि दृष्टिहीन लोग भी सपने देखते हैं। हालांकि उनके सपनों का स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि उन्होंने अपनी दृष्टि जन्म से नहीं पाई या फिर जीवन के किसी बाद के चरण में खोई। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, जन्म से या बचपन से दृष्टिहीन लोगों के सपनों का अनुभव उन लोगों से काफी अलग होता है, जिन्होंने बाद में अपनी आंखों की रोशनी गंवाई।

जन्म से दृष्टिहीन लोगों के सपने कैसे होते हैं?

विशेषज्ञों के मुताबिक, जो लोग जन्म से दृष्टिहीन होते हैं या चार से पांच वर्ष की उम्र तक अपनी दृष्टि खो देते हैं, उनके मस्तिष्क में दृश्य स्मृतियां मौजूद नहीं होतीं। ऐसे में उनके सपनों में चेहरे, रंग या दृश्य दिखाई नहीं देते। इसके बजाय उनका मस्तिष्क ध्वनि, स्पर्श, गंध, स्वाद और भावनाओं के आधार पर सपनों का निर्माण करता है।

ध्वनि और स्पर्श निभाते हैं सबसे बड़ी भूमिका

जन्म से दृष्टिहीन लोगों के सपनों में सुनने की क्षमता सबसे प्रमुख होती है। बातचीत की आवाजें, संगीत, आसपास की ध्वनियां और रोजमर्रा के श्रव्य अनुभव उनके सपनों का अहम हिस्सा बनते हैं। इसके साथ ही स्पर्श भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वे सपनों में वस्तुओं की बनावट, आकार, तापमान और शारीरिक संवेदनाओं को उसी तरह महसूस करते हैं, जैसे सामान्य दृष्टि वाले लोग दृश्य अनुभव करते हैं।

गंध, स्वाद और भावनाओं से बनती है सपनों की दुनिया

दृष्टिहीन लोगों के सपनों में पसंदीदा भोजन का स्वाद, फूलों की खुशबू, परिचित स्थानों की गंध और अन्य इंद्रिय अनुभव भी शामिल हो सकते हैं। खुशी, दर्द, उत्साह और चिंता जैसी भावनाएं भी उनके सपनों में उतनी ही तीव्र होती हैं, जितनी सामान्य दृष्टि वाले लोगों के सपनों में होती हैं। डेनिश शोधकर्ताओं और स्लीप फाउंडेशन की रिसर्च के अनुसार, जन्म से दृष्टिहीन लोगों के लगभग 86 प्रतिशत सपनों में सुनने का अनुभव और करीब 70 प्रतिशत सपनों में स्पर्श का अनुभव शामिल होता है।

बाद में दृष्टि खोने वालों के सपने क्यों होते हैं अलग?

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, जो लोग पांच से सात वर्ष की उम्र के बाद अपनी दृष्टि खो देते हैं, उनके मस्तिष्क में पहले से दृश्य स्मृतियां सुरक्षित रहती हैं। इसी कारण वे अपने सपनों में लोगों के चेहरे, स्थानों और रंगों को देख सकते हैं। उनके सपनों में दृश्य अनुभव सामान्य दृष्टि वाले लोगों की तरह बने रहते हैं।

रिसर्च में सामने आई एक और अहम बात

शोध यह भी बताता है कि दृष्टिबाधित लोगों को जन्म से दृष्टिहीन लोगों की तुलना में बुरे सपने आने की संभावना लगभग चार गुना अधिक होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सपनों का स्वरूप व्यक्ति के जीवन अनुभवों और मस्तिष्क में मौजूद स्मृतियों पर निर्भर करता है।

vineet verma

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