डीके शिवकुमार सीएम अटकलें, कर्नाटक कांग्रेस नेतृत्व संकट
कर्नाटक में 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस की सरकार तो बन गई, लेकिन तभी से मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर सस्पेंस भी बना हुआ है। चुनाव जीतने के बाद सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच सीएम बनने की रेस किसी से छिपी नहीं थी। तब कांग्रेस हाईकमान ने हालात संभालने के लिए एक अनौपचारिक लेकिन चर्चित पावर-शेयरिंग फॉर्मूला अपनाया। कहा गया कि पहले 2.5 साल सिद्धारमैया मुख्यमंत्री रहेंगे और उसके बाद बारी डीके शिवकुमार की होगी। इस फॉर्मूले को कागज पर भले न लिखा गया हो, लेकिन पार्टी के अंदर इसे लगभग सभी ने सच मान लिया।
सिद्धारमैया को अहिंदा यानी अल्पसंख्यक, पिछड़े और दलित समुदायों का बड़ा चेहरा माना जाता है, जबकि वोकालिगा समुदाय से आने वाले डीके शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। उस वक्त लगा कि कांग्रेस ने बैलेंस बना लिया है, लेकिन राजनीति में बैलेंस कब तक टिकता है, यह अब साफ दिख रहा है।
20 नवंबर 2025 को सरकार के 2.5 साल पूरे होते ही वह फॉर्मूला फिर चर्चा में आ गया। सवाल उठने लगा कि क्या सिद्धारमैया अब कुर्सी छोड़ेंगे या नहीं। शिवकुमार समर्थकों ने पूजा-पाठ, बयानबाजी और सोशल मीडिया के जरिए दबाव बनाना शुरू कर दिया। वहीं, सिद्धारमैया खेमे ने इसे मीडिया की बनाई हुई कहानी बता दिया। इस खींचतान के बीच कांग्रेस की एकता पर सवाल उठने लगे, खासकर इसलिए क्योंकि पार्टी पहले ही राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में अंदरूनी कलह का नुकसान झेल चुकी है।
इस सियासी ड्रामे का नया अध्याय 13 जनवरी 2026 को मैसूरु एयरपोर्ट पर देखने को मिला, जब राहुल गांधी ने सिद्धारमैया और शिवकुमार से अलग-अलग और फिर साथ में मुलाकात की। मुलाकात भले कुछ मिनटों की रही हो, लेकिन संदेश बड़ा था। अंदरखाने की बातों के मुताबिक, सिद्धारमैया ने बजट और कैबिनेट फेरबदल पर चर्चा की, जबकि शिवकुमार ने ढाई साल वाला फॉर्मूला याद दिलाया।
हालांकि, सिद्धारमैया ने किसी भी राजनीतिक बातचीत से इनकार करते हुए कहा कि यह सब मीडिया की अटकलें हैं और अंतिम फैसला हाईकमान का होगा। इससे एक दिन पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का बयान भी आया कि जरूरत पड़ी तो दोनों नेताओं को दिल्ली बुलाया जाएगा। इस बयान ने साफ कर दिया कि हाईकमान मामले पर नजर तो रखे हुए है, लेकिन अभी कोई बड़ा फैसला लेने के मूड में नहीं है।
इसी बीच डीके शिवकुमार का 14 जनवरी का सोशल मीडिया पोस्ट, जिसमें उन्होंने ‘प्रार्थना’ का जिक्र किया, आग में घी डालने जैसा साबित हुआ। समर्थकों ने इसे सीएम बनने की उम्मीद से जोड़ दिया, जबकि भाजपा ने इसे कांग्रेस की अंदरूनी कलह का सबूत बता दिया।
कर्नाटक की राजनीति में जातीय समीकरण बहुत अहम हैं। सिद्धारमैया अहिंदा वोट बैंक के मजबूत स्तंभ हैं, जिसने कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाया। वहीं, शिवकुमार वोकालिगा समुदाय का बड़ा चेहरा हैं, जो दक्षिण कर्नाटक में निर्णायक भूमिका निभाता है। अगर शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया जाता है, तो अहिंदा वर्ग नाराज हो सकता है। अगर सिद्धारमैया बने रहते हैं, तो वोकालिगा वोट भाजपा की ओर खिसकने का खतरा है। भाजपा पहले से ही ‘ऑपरेशन लोटस’ की चर्चा को हवा दे रही है।
यह पूरा विवाद कांग्रेस की एक पुरानी कमजोरी भी दिखाता है—हाईकमान पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता। राहुल गांधी भले ही फायरफाइटर की भूमिका निभा रहे हों, लेकिन फैसले में देरी पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है। सोशल मीडिया पर वायरल छोटे-छोटे वीडियो और इशारे, जैसे मिठाई न लेना, यह दिखाने के लिए काफी हैं कि सब कुछ सामान्य नहीं है।
अब चार संभावनाएं सामने आती हैं—सिद्धारमैया पूरे पांच साल मुख्यमंत्री रहें, शिवकुमार को सीएम बनाया जाए, किसी नए राजनीतिक समीकरण से भाजपा-जेडीएस की एंट्री हो, या फिर कोई बड़ा राजनीतिक उलटफेर। फैसला जो भी हो, गेंद पूरी तरह हाईकमान के पाले में है।
कुल मिलाकर, कर्नाटक कांग्रेस इस वक्त एक बड़े इम्तिहान से गुजर रही है। अगर समय रहते फैसला नहीं हुआ, तो इसका फायदा विपक्ष उठाएगा और असर सिर्फ राज्य की राजनीति पर नहीं, बल्कि आने वाले लोकसभा चुनावों पर भी पड़ेगा। शिवकुमार की पोस्ट में भले ‘प्रार्थना’ की बात हो, लेकिन राजनीति में आखिरकार प्रार्थना नहीं, सही समय पर लिया गया फैसला ही काम आता है।
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