मिडल ईस्ट (Middle East) में शांति की तमाम कोशिशों को उस वक्त बड़ा झटका लगा, जब सीजफायर के दावों के बीच ईरान और इजराइल ने एक-दूसरे पर ताबड़तोड़ मिसाइल हमले कर दिए।
इस अप्रत्याशित हमले ने पूरे क्षेत्र को फिर से महायुद्ध की आग में झोंक दिया है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह हमला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस सीधी चेतावनी के बाद हुआ, जिसमें उन्होंने इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को तेहरान पर हाथ न डालने की सख्त सलाह दी थी।
इजराइल की इस ‘क्षेत्रीय विस्तार’ और कब्जे की नीति ने न सिर्फ सीजफायर को संकट में डाला है, बल्कि खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी सीधे ईरान के निशाने पर ला खड़ा किया है।
इस पूरे तनाव और इसके पीछे की इनसाइड स्टोरी को हम 5 बड़े सुलगते सवालों और जवाबों के जरिए आसान भाषा में समझते हैं:
जवाब: इसके पीछे वजह है खोया हुआ भरोसा और राजनीतिक अस्तित्व। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी साल फरवरी के अंत में जब अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमला किया था, तब नेतन्याहू ने ट्रंप को भरोसा दिलाया था कि इस हमले के बाद ईरान में तख्तापलट (Regime Change) हो जाएगा। इसी वादे पर ट्रंप ने हरी झंडी दी थी, लेकिन तख्तापलट नहीं हुआ। इसके बाद अमेरिका ने बैकचैनल से ईरान के साथ शांति बातचीत शुरू कर दी, जिससे इजराइल खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा है।
इजराइल चाहता है कि समझौते में ईरान की लंबी दूरी की मिसाइलों पर बैन लगे और हिजबुल्लाह, हमास व हूती जैसे प्रॉक्सी पूरी तरह खत्म हों। मगर अमेरिका सिर्फ परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) पर बात कर रहा है। गाजा और लेबनान मोर्चे पर पहले ही बैकफुट पर चल रहे नेतन्याहू को डर है कि इस साल के अंत में होने वाले इजराइल के आम चुनावों में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ सकता है। ऐसे में वे अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए जंग का सहारा ले रहे हैं।
जवाब: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि इजराइल वही करेगा जो वो कहेंगे, और उन्होंने ‘बीबी’ (नेतन्याहू) को रुकने के लिए कहा था। इसके बावजूद इजराइल ने भू-मध्य सागर (Mediterranean Sea) से ईरान पर मिसाइलें दाग दीं। दरअसल, इजराइल इस वक्त लेबनान में हिजबुल्लाह के चौतरफा हमलों से घिरा है। यदि नेतन्याहू हिजबुल्लाह को कड़ा जवाब नहीं देते हैं, तो इजराइल के भीतर उनकी बची-खुची राजनीतिक जमीन भी खिसक जाएगी। यही मजबूरी अमेरिका को लाचार बना रही है।
जवाब: दोनों देशों के बीच समझौते का ब्लूप्रिंट तैयार है, जिसे पाकिस्तान के जरिए ईरान को भेजा गया है। रविवार (7 जून) को पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने तेहरान का दौरा कर ईरानी अधिकारियों को प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का एक गोपनीय पत्र सौंपा। इस पूरी सीक्रेट डिप्लोमेसी में पाकिस्तान, अमेरिका और ईरान के बीच आधिकारिक मध्यस्थ (Messenger) की भूमिका निभा रहा है और अब आखिरी फैसला ईरान को लेना है।
जवाब: समझौते की राह में तीन बड़े रोड़े हैं:
जवाब: यदि यह युद्ध पूर्ण रूप से भड़कता है, तो ईरान की पहली रणनीति बाब-अल-मंडेब और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की पूरी तरह नाकेबंदी करने की होगी। लाल सागर से ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाले इस रूट से दुनिया का लगभग 15% व्यापार होता है। इसकी बंदी से एशिया, यूरोप और अफ्रीका में कच्चे तेल और गैस की भयंकर किल्लत हो जाएगी, जिससे वैश्विक मंदी और महंगाई का नया दौर शुरू हो सकता है।
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