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‘केजरीवाल vs जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा: जज के खिलाफ सत्याग्रह का ऐलान, जानें-केजरीवाल के 5 बड़े सवाल?

नई दिल्ली। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कथित शराब घोटाले से जुड़ी कानूनी लड़ाई को एक अभूतपूर्व स्तर पर पहुंचा दिया है। रिक्यूजल याचिका (केस से हटने की अर्जी) खारिज होने के बाद, केजरीवाल ने अब जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ ‘सत्याग्रह’ का बिगुल फूंक दिया है।

‘सत्याग्रह’ के तहत 5 बड़े ऐलान: कोर्ट रूम में नहीं होंगे पेश

केजरीवाल ने महात्मा गांधी के सिद्धांतों का हवाला देते हुए न्यायपालिका के इतिहास में संभवतः पहला ऐसा कदम उठाया है जहाँ एक आरोपी ने जज के खिलाफ बहिष्कार का रास्ता चुना है। उन्होंने निम्नलिखित घोषणाएं की हैं:

केजरीवाल या उनके वकील अब जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत में शराब घोटाले से जुड़े किसी भी मामले की सुनवाई में शामिल नहीं होंगे।

केजरीवाल ने फिर दोहराया कि उन्हें इस बेंच से न्याय की उम्मीद नहीं है।

पूर्व सीएम ने कहा कि वे इस अदालत में तभी पेश होंगे जब मामले में सीबीआई, केंद्र सरकार या सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पक्षकार नहीं होंगे।

केजरीवाल के मुताबिक, यह हार-जीत का सवाल नहीं, बल्कि न्यायपालिका की साख और सिद्धांतों की रक्षा का मामला है। रिक्यूजल याचिका खारिज होने के फैसले को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी की जा रही है।

“हार-जीत मायने नहीं रखती, सवाल सही और गलत का है”

वीडियो संदेश के जरिए केजरीवाल ने भावुक अपील करते हुए कहा कि उन्होंने पहले जज से गरिमापूर्ण तरीके से केस से हटने की गुजारिश की थी, लेकिन इनकार के बाद उनके पास सत्याग्रह के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। उन्होंने कहा, “जिंदगी में कई बार हमें मुश्किल रास्ता चुनना पड़ता है ताकि लोगों का न्यायपालिका पर विश्वास बना रहे।”

क्या है विवाद की जड़?

विवाद तब शुरू हुआ जब केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा पर ‘हितों के टकराव’ का आरोप लगाते हुए उन्हें केस से हटने को कहा था। हालांकि, अदालत ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए याचिका खारिज कर दी। अब केजरीवाल का यह ‘असहयोग आंदोलन’ कानूनी विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बन गया है कि क्या यह ‘कोर्ट की अवमानना’ (Contempt of Court) के दायरे में आएगा या नहीं।

news desk

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