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Nepal Flood के बाद India में बढ़ा Glacier Lake का खतरा! Sikkim की 7 झीलें हाई रिस्क, NDMA ने बढ़ाई निगरानी

नेपाल में ग्लेशियल झील फटने से आई विनाशकारी बाढ़ के बाद भारत ने भी अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने सिक्किम में 40 ऐसी ग्लेशियल झीलों की पहचान की है, जिनसे बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है. इनमें 7 झीलों को हाई रिस्क कैटेगरी में रखा गया है.

नई दिल्ली/गंगटोक। नेपाल में ग्लेशियल झील फटने के बाद आई भीषण बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में मौजूद ग्लेशियल झीलों के खतरे को एक बार फिर सामने ला दिया है। इस घटना के बाद भारत में भी संवेदनशील ग्लेशियल झीलों को लेकर निगरानी और आपदा प्रबंधन की तैयारियां तेज कर दी गई हैं।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने सिक्किम में 40 उच्च-खतरे वाली ग्लेशियल झीलों की पहचान की है. इनमें से 7 झीलों को उच्च जोखिम वाली माना गया है। इनमें से प्राथमिकता वाली संवेदनशील झीलों का वैज्ञानिक आकलन भी किया जा रहा है, ताकि किसी संभावित ग्लेशियल झील आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF के खतरे को समय रहते समझा और कम किया जा सके।

17 हजार फीट की ऊंचाई पर मौजूद हैं कई संवेदनशील झीलें

अधिकारियों के मुताबिक सिक्किम में 400 से ज्यादा ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं. इनमें से कुछ झीलें करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं. ऊंचाई वाले इलाकों में मौजूद इन झीलों पर ग्लेशियर, हिमस्खलन, भूस्खलन और बदलते मौसम का असर पड़ सकता है।

जोखिम का आकलन करते समय झील की गहराई, उसमें मौजूद पानी की मात्रा, झील को रोकने वाली मोरेन की मजबूती और आसपास के हिमस्खलन या भूस्खलन के खतरे जैसे पहलुओं की जांच की जा रही है।

इसका मकसद यह पता लगाना है कि किसी प्राकृतिक घटना के बाद झील की संरचना कितनी सुरक्षित रह सकती है और अगर पानी अचानक बाहर निकलता है तो नीचे के इलाकों पर उसका कितना असर पड़ सकता है।

रियल टाइम मॉनिटरिंग और अर्ली वार्निंग सिस्टम पर जोर

सिक्किम सरकार ने संवेदनशील झीलों से जुड़े खतरे को कम करने के लिए निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की योजना बनाई है।

शाको चू, केरांग और डोलमा संपांग जैसी जगहों पर ऑटोमेटेड मॉनिटरिंग स्टेशन काम कर रहे हैं. इन स्टेशनों के जरिए झीलों और आसपास के हालात पर नजर रखने की कोशिश की जा रही है।

इसके अलावा मौसम की ऐसी परिस्थितियों पर नजर रखने के लिए डॉपलर वेदर रडार लगाने की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं, जो हिमस्खलन या भूस्खलन जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ा सकती हैं।

2023 की त्रासदी से लिया गया सबक

सिक्किम पहले ही ग्लेशियल झील से पैदा हुई विनाशकारी बाढ़ का सामना कर चुका है।

अक्टूबर 2023 में साउथ लोनाक झील में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड की घटना हुई थी. इसके बाद तीस्ता नदी बेसिन में अचानक भारी बाढ़ आई थी। इस आपदा में जान-माल का बड़ा नुकसान हुआ और सड़क, पुल तथा अन्य बुनियादी ढांचे को भी भारी क्षति पहुंची थी।

यही वजह है कि हिमालयी क्षेत्र में मौजूद ग्लेशियल झीलों की निगरानी अब सिर्फ पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि आपदा प्रबंधन और लोगों की सुरक्षा से जुड़ा अहम विषय बन गई है।

नेपाल की घटना के बाद क्यों बढ़ी चिंता?

नेपाल में हालिया बाढ़ ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बदलते मौसम और ग्लेशियरों से जुड़ी घटनाओं के बीच भारत कितना तैयार है।

हालांकि किसी खास झील के टूटने की भविष्यवाणी करना संभव नहीं है, लेकिन संवेदनशील झीलों की पहचान, वैज्ञानिक अध्ययन, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और अर्ली वार्निंग सिस्टम संभावित नुकसान को कम करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

अब सिक्किम में सबसे बड़ा फोकस यही है कि खतरे वाली ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी हो, संभावित खतरे का पहले पता चले और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों तक समय रहते चेतावनी पहुंचाई जा सके।

news desk

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