तारीख थी 31 दिसंबर और साल था 1984. जब देश में हुए आम चुनाव के परिणाम घोषित हुए तो एक नया इतिहास बन चुका था। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में 414 सीटें हासिल कर कांग्रेस ने न सिर्फ सत्ता की राह तय की बल्कि ये एक तरह से भारतीय राजनीति में उसके वर्चस्व के ऐलान था।
जो काम पंडित नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी जैसे दिग्गज नेता नहीं कर पाए थे वो काम राजनीति में परिस्थितियोंवश नये-नये आए राजीव गांधी ने कर दिया था। ये देश के इतिहास का सबसे बड़ा बहुमत था। ये बहुमत कांग्रेस का शीर्ष भी साबित हुआ। शीर्ष यानी वो चोटी, जहां ठहराव नहीं होता।
ऐसा क्या हुआ कि लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे बड़ा बहुमत हासिल करने के बाद कांग्रेस बहुमत से दूर होती गई और आजतक दोबारा पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बना पाई। ये सवाल तब और महत्वपूर्ण बन जाता है जब कांग्रेस अपने 140वें वर्ष में प्रवेश कर रही है।
अगले ही आम चुनाव में यानी 1989 में कांग्रेस 197 सीटें ही जीत पाई। भ्रष्टाचार के आरोप कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने में कारगर रहे। 1991 के चुनाव में कांग्रेस को फिर झटका लगा। बीच चुनाव पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या हो गई। इस चुनाव में सहानुभूति के बावजूद कांग्रेस 232 सीटों पर सिमट गई।
1996 में कांग्रेस ने 140 सीटें, 1998 में 141 सीटें और 1999 में 114 सीटों के साथ कांग्रेस केन्द्र की सत्ता से बाहर ही रही। लगभग 8 साल बाद 2004 में कांग्रेस ने वापसी की और 145 सीटों के साथ गठबंधन की सरकार बनाने में कामयाब रही। 2009 में 206 सीटों के साथ कांग्रेस सत्ता बनाए रखी। लेकिन 2014 में 44, 2019 में 52 और 2024 में 99 सीट के साथ विपक्ष की भूमिका में ही रही।
80 के दशक के लगभग आखिरी में कांग्रेस के सिमटने की शुरूआत देखी जाती है। ये बिलकुल वही समय था, जब देश की राजनीति में बड़े बदलाव हो रहे थे। स्वतंत्र भारत की दूसरी पीढ़ी, जिसने आजादी की लड़ाई का दौर नहीं देखा था, वो मतदाता बन चुकी थी। हिंदुत्व और मंडल की राजनीति हावी हो रही थी। लेकिन इन बदलावों के लिए कांग्रेस के पास ना कोई एजेंडा था और ना नीति। ऐसे समय में कांग्रेस नेतृत्व के शून्य से गुजर रही थी। राजीव गांधी की हत्या के बाद गांधी परिवार ने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली और कोई भी दूसरा कांग्रेस को संभाल पाने में असफल रहा था।

तथ्य बताते हैं कि कांग्रेस सत्ता में वापसी तभी कर पाई, जब गांधी नेहरू परिवार ने सक्रिय राजनीति में वापसी की। सोनिया गांधी ने जब 1998 में पार्टी का बागडोर संभाला, उसके बाद ही पहले पार्टी संभली। फिर सत्ता में वापसी हो पाई। राजीव गांधी के जाने और सोनिया गांधी के आने के बीच न सिर्फ सत्ता गई बल्कि अर्जुन सिंह, एनडी तिवारी समेत कई बड़े दिग्गज नेता भी पार्टी से अलग हुए। चुनाव हारने से ज्यादा बुरा भीतरी सिर-फुटौव्वल होता है। कांग्रेस दोनों मोर्चे से जूझ रही थी। ये सिर-फुटौव्वल सत्ता में वापसी के बाद भी जारी रहा। शीर्ष नेता अपने अपने पद तक खुद को समेटते दिखे। नेतृत्व और नेरेटिव के अभाव में कार्यकर्ता बिखरते चले गए।
गुजरते समय के साथ बदलती राजनीति के बीच कांग्रेस सिर्फ गवर्नेंस पर टिकी रही। यूपीए 1 और 2 के दौरान मनरेगा, आरटीआई, एनआरएचएम, सर्वशिक्षा अभियान, किसान ऋण माफी, 123 एग्रीमेंट, खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013, शिक्षा का अधिकार, भूमि अधिग्रहण, राष्ट्रीय खाद्य मिशन, डीबीटी की शुरूआत जैसी बड़ी योजनाएं उसके खाते में तो थीं लेकिन पार्टी का संगठन कमजोर हो चुका था। राजनीति के बदले मुद्दों में कांग्रेस की हिस्सेदारी सिमट चुकी थी। विपक्ष की चाल को समझने और उसे काउंटर देने वाले रणनीतिकार गायब थे। हिंदी पट्टी में कांग्रेस के पास जाति का कोटा भी खाली था। शीर्ष नेता आपस में ही शह मात का खेल खेल रहे थे। नतीजा ये हुआ कि विपक्ष और मीडिया का चेहरा बने अन्ना आंदोलन के नैरेटिव से लड़ना तो दूर टिकना भी दूभर हो गया।
इस दौरान कांग्रेस ने सत्ता गंवाई और प्रतिष्ठा भी। इतिहास के सारे आरोप मढ़ दिए गए। 2004 में राजनीति में आए राहुल गांधी के ऊपर देश की गलतियों और गांधी नेहरू की सारी ‘जिम्मेदारियों’ का बोझ लाद दिया गया। कांग्रेस के भीतर एक कांग्रेस उभर आई, जो बीजेपी से पेंग बढ़ाती देखी गई। राहुल गांधी पर आरोप लगाकर बीजेपी ज्वाइन करने वाले नेताओं की लंबी कतार खड़ी हो गई।
सफलता और असफलता के बीच तथ्यों और तारीख के हिसाब से देखे तो गांधी परिवार और कांग्रेस एक दूसरे के पर्याय नजर आते हैं। 1991 के बाद से गांधी परिवार की राजनीति से दूरी कांग्रेस के लिए घातक साबित हुई थी तो 2014 में विरोधी दल बीजेपी ने राहुल गांधी पर ही निशाना साधे रखा। जब इतिहास के सबसे बड़े कटघरे में राहुल गांधी को खड़ा किया गया, तभी ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के नारे भी लगे।

जब लगने लगा कि कांग्रेस शायद इतिहास की किताबों तक सिमट जाएगी, तब राहुल गांधी ने एक अलग रास्ता चुना। भारत के आखिरी दक्षिण छोर से उत्तर के अंतिम छोर तक लगभग 4 हजार किमी दूरी 145 दिन में पैदल तय कर राहुल गांधी ने कांग्रेस को ऑक्सीजन दिया। राहुल गांधी ने कहा कि ‘ये यात्रा सत्ता के लिए नहीं, संवाद के लिए थी’। संविधान, सामाजिक न्याय, दलित, गरीब, महिला और युवाओं के मुद्दों के इर्द-गिर्द राजनीति को फिर से खड़ा करने की कोशिश थी।
राहुल गांधी की कोशिशों से 2024 में कांग्रेस गर्त से निकल कर जमीन पर आई। हालांकि सत्ता अभी भी दूर है। लेकिन कांग्रेस के लिए असली चुनौती सत्ता नहीं वो प्रतिष्ठा हासिल करना है जो उसने आजादी की लड़ाई के बाद बनाई थी। इतिहास गवाह है, लोकतंत्र में कोई भी पार्टी स्थायी रूप से खत्म नहीं होती। लेकिन वापसी उन्हीं की होती है, जो मुद्दे और संगठन से जनता को जोड़ लेते हैं।