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समंदर में टकराव! रूसी झंडे वाले तेल टैंकर पर कब्जा, क्या ट्रंप ने तोड़ा अंतरराष्ट्रीय कानून?

अमेरिका और रूस के बीच एक बार फिर तनाव बढ़ने की खबरें सामने आ रही हैं। अमेरिकी सेना ने उत्तरी अटलांटिक और कैरेबियन सागर में “बैक-टू-बैक” ऑपरेशन चलाते हुए वेनेजुएला के तेल निर्यात से जुड़े दो टैंकर जहाजों पर कब्जा कर लिया है। इस कार्रवाई के बाद दोनों देशों के बीच टकराव की स्थिति बन गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूसी झंडे वाले ‘मेरिनेरा’ नाम के टैंकर को लेकर अमेरिका ने बेहद सख्त रुख अपनाया। अमेरिकी सेना ने करीब दो हफ्ते तक पीछा करने के बाद इस टैंकर पर नियंत्रण स्थापित किया। बताया जा रहा है कि यह जहाज आइसलैंड और स्कॉटलैंड के बीच समुद्री मार्ग से गुजर रहा था। रूसी झंडा लगे होने के कारण इसे रूस में पंजीकृत जहाज माना जा रहा था, इसके बावजूद अमेरिकी कार्रवाई को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।

इस पूरे ऑपरेशन में ब्रिटेन की रॉयल नेवी की भूमिका भी सामने आई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ब्रिटिश नौसेना ने हवाई और समुद्री निगरानी के जरिए अमेरिका को खुफिया मदद प्रदान की।

इतना ही नहीं, अमेरिका ने इसी अभियान के तहत दूसरे टैंकर एम/टी सोफिया को भी अपने कब्जे में ले लिया। अमेरिकी अधिकारियों ने बयान जारी कर कहा कि इस जहाज पर “अवैध गतिविधियों के संचालन” का आरोप है। कैरेबियन सागर में अमेरिकी जवानों ने हेलीकॉप्टर की मदद से जहाज पर उतरकर उसे अपने नियंत्रण में लिया। बताया गया कि इस टैंकर पर कोई राष्ट्रीय झंडा नहीं लगा हुआ था।

विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिका का यह कदम काफी खतरनाक और भड़काऊ माना जा रहा है। हाल ही में अमेरिका ने वेनेजुएला में बड़ी कार्रवाई करते हुए तेल भंडारों पर दबाव बढ़ाया है। उसकी रणनीति वेनेजुएला के कच्चे तेल के बड़े हिस्से के निर्यात को रोकने की बताई जा रही है, जिससे वैश्विक राजनीति में तनाव और गहराने की आशंका जताई जा रही है।

रूस के परिवहन मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि संबंधित जहाज को रूसी झंडे के इस्तेमाल की अस्थायी अनुमति दी गई थी। मंत्रालय का कहना है कि किसी भी देश को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी अन्य राष्ट्र के अधिकार क्षेत्र में विधिवत पंजीकृत जहाज के खिलाफ बल प्रयोग करे।

रूसी अधिकारियों ने आरोप लगाया है कि अमेरिका की यह कार्रवाई समुद्री कानूनों का सीधा उल्लंघन है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों के तहत यह कदम अवैध माना जाता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वाकई डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी सेना ने कानून की सीमाएं लांघीं? क्या यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है? आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं।

रूस के परिवहन मंत्रालय का दावा है कि अमेरिका की यह कार्रवाई अनुच्छेद-92 के नियमों के खिलाफ है। रूस का कहना है कि संबंधित जहाज की रजिस्ट्री में बदलाव कर उसे रूसी झंडा 24 दिसंबर को ही प्रदान कर दिया गया था, ऐसे में उस पर किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है।

वहीं अमेरिका ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि जहाज के पतवार पर रूसी झंडा 31 दिसंबर को लगाया गया, और उससे पहले वह किसी वैध राष्ट्रीय झंडे के अंतर्गत संचालित नहीं था। अमेरिका का तर्क है कि इसी वजह से अनुच्छेद-92 के तहत जहाज के खिलाफ कार्रवाई की गई।

अब इस मुद्दे पर दोनों देशों के दावे आमने-सामने हैं और अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून को लेकर बहस और तेज होती जा रही है।द कन्वर्सेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, अनुच्छेद-92 में यह प्रावधान भी शामिल है कि कोई जहाज यात्रा के दौरान या जिस बंदरगाह पर वह जा रहा है, वहां अपना झंडा नहीं बदल सकता, जब तक कि उसकी रजिस्ट्री में वास्तविक बदलाव न हुआ हो। आमतौर पर इसका मतलब यह समझा जाता है कि समुद्र में यात्रा के बीच झंडा बदलने की अनुमति बिल्कुल नहीं है।

हालांकि, जब इस अनुच्छेद को बारीकी से पढ़ा जाए तो तस्वीर कुछ अलग नजर आती है। नियम साफ तौर पर कहता है कि यदि जहाज की रजिस्ट्री में विधिवत बदलाव हो चुका है, तो यात्रा के दौरान भी झंडा बदला जा सकता है। यानी झंडा बदलने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, बल्कि यह रजिस्ट्री में हुए कानूनी बदलाव से जुड़ा हुआ है।

news desk

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