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कोर्ट में जूता फेंकने की घटना पर CJI ने तोड़ी चुप्पी, आरोपी पर Zero FIR, लेकिन गिरफ्तारी अब भी नहीं… आखिर क्यों इतने धीरे हो रही है कार्रवाई?

देश की सर्वोच्च अदालत में 6 अक्टूबर को हुई अभूतपूर्व घटना ने पूरे न्यायिक तंत्र को हिला दिया था. कोर्ट नंबर-1 में उस वक्त अफरा-तफरी मच गई जब एक वरिष्ठ वकील ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बी. आर. गवई की ओर जूता फेंकने की कोशिश की. घटना के तुरंत बाद सुरक्षा कर्मियों ने आरोपी को पकड़ लिया, लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि इतने दिनों बाद भी आरोपी को गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया?

वहीँ सीजेआई बीआर गवई ने पहली बार इस पूरे मामले पर चुप्पी तोड़ते हुए कहा, “सोमवार को जो हुआ, उससे मैं और मेरे विद्वान साथी बहुत स्तब्ध हैं, हमारे लिए यह एक भुला दिया गया अध्याय है.”

Zero FIR हुई… पर फिर चुप क्यों है पुलिस?

इस घटना को अब एक हफ्ता बीत चुका है, और कल बुधवार को इतने दिनों बाद बेंगलुरु पुलिस ने “Zero FIR” दर्ज कर ली, लेकिन दिल्ली पुलिस—जो सुप्रीम कोर्ट परिसर की सुरक्षा की जिम्मेदार है—अब तक खामोश है. न कोई गिरफ्तारी, न कोई आधिकारिक बयान. सवाल यह है कि जब यह हमला सीधे देश की सर्वोच्च न्यायपालिका पर हुआ, तो फिर कानून की कार्रवाई इतनी धीमी क्यों है? हालांकि सीजेआई ने उन्हें माफ़ कर दिया था पर क्या कानून की कोई जिम्मेदारी नहीं थी? जो भी हो फिलहाल आरोपी पर Zero FIR के तहत FIR दर्ज हो चुका है.

बता दें किZero FIR वह कानूनी प्रक्रिया है जिसमें अपराध किसी भी थाने में दर्ज किया जा सकता है, चाहे वह घटना क्षेत्राधिकार से बाहर ही क्यों न हो. इसका मकसद होता है, शिकायत दर्ज करने में देरी न हो. परंतु इस केस में FIR दर्ज होने के बाद भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया है.

बार काउंसिल ने तुरंत किया सस्पेंड — लेकिन कानून हाथ बांधे बैठा है

बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने आरोपी वकील का लाइसेंस तुरंत निलंबित कर दिया — यह दिखाता है कि संस्था ने अनुशासनात्मक जिम्मेदारी निभाई. लेकिन पुलिस की चुप्पी अब खुद एक “मिस्ट्री” बन चुकी है. आखिर जब सबूत कोर्टरूम में मौजूद थे, आरोपी मौके पर ही पकड़ लिया गया था, तो एक हफ्ते बाद भी गिरफ्तारी क्यों नहीं?

कानूनी विशेषज्ञों की राय — “यह सिर्फ अपराध नहीं, लोकतंत्र पर हमला है”

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि “अगर सुप्रीम कोर्ट में बैठे CJI भी सुरक्षित नहीं हैं, तो यह पूरे न्यायिक सिस्टम के लिए खतरे की घंटी है.” कोर्ट में जूता फेंकने जैसा कृत्य केवल Contempt of Court नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा पर सीधा हमला है.

कानून सबके लिए बराबर है या नहीं — यह अब इस केस की सबसे बड़ी कसौटी बन चुका है. क्या यह सिर्फ एक आम आदमी का गुस्सा था, या फिर किसी संगठित सोच की साजिश?

देश अब जवाब मांग रहा है — CJI पर हमला करने वाले पर कार्रवाई कब होगी? और क्या न्यायपालिका खुद अपने ही सम्मान की रक्षा कर पाएगी?

news desk

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