कप सिरप से बच्चों की मौत!
राजस्थान में कफ सिरप पीने से बच्चों की एक के बाद एक मौत के मामले सामने आने के बाद हड़कंप मच गया है. मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य के ड्रग कंट्रोलर ने डेक्सट्रोमेथॉर्फन हाइड्रोब्रोमाइड (Dextromethorphan hydrobromide) कफ सिरप पर तत्काल रोक लगा दी है. हालांकि, अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बच्चों की जान जाने से पहले आखिर ऐसी दवाएं मेडिकल स्टोरों में कैसे बेची जा रही थीं और क्यों ड्रग कंट्रोल विभाग ने समय रहते कोई सख्त कार्रवाई नहीं की ?
बच्चों की मौत के कई मामले आ चुके हैं सामने
दरअसल कुछ दिनों से राजस्थान से ऐसे कई मामले सामने आये हैं, जहां इस कफ सिरप को पीने के बाद बच्चों की तबियत बुरी तरह बिगड़ गई और उनकी मौत हो गई. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राजस्थान के भरतपुर में 4 साल की बच्ची और जयपुर में 2 साल की बच्ची की हालत बिगड़ गई थी. वहीं सीकर में इस कफ सिरप को पीने के बाद 5 साल के मासूम की मौत हो गई थी.
इससे पहले भी मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में इस तरह के मामले सामने आये थे जब दो अलग-अलग कंपनियों के सिरप पीने से पिछले एक महीने में छह बच्चों की मौत हो चुकी है. दरअसल ये घटनाएं केवल एक दवा की खामी नहीं, बल्कि दवा की गुणवत्ता और सुरक्षा तंत्र की गंभीर खामियों को उजागर कर रही हैं.
पहले भी उठ चुके हैं भारतीय दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल
भारत दुनिया के सबसे बड़े जेनेरिक दवा निर्यातकों में से एक है, लेकिन हाल के वर्षों में देश की दवाओं की गुणवत्ता को लेकर कई बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सवाल उठ चुके हैं. गाम्बिया और उज्बेकिस्तान जैसे देशों में भारतीय खांसी की दवाओं से बच्चों की मौत के आरोप लगे थे.
कब होगी जवाबदेही तय ?
सवाल यह है कि जब ड्रग्स कंट्रोल विभाग के पास नियमित सैंपल टेस्टिंग और निगरानी की जिम्मेदारी है, तो बच्चों की जान जाने के बाद ही कार्रवाई क्यों होती है? स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में दवा नियामक प्रणाली अभी भी बिखरी हुई है और राज्यों के स्तर पर निगरानी कमजोर है. कई बार दवाओं की क्वालिटी चेक केवल कागजों में पूरी हो जाती है. यही कारण है कि बाजार में निम्न गुणवत्ता की दवाएं पहुंचती हैं और आम लोग, खासकर बच्चे, इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाते हैं. फिलहाल प्रशासन ने सिरप पर रोक लगाकर जांच का आदेश दे दिया है.
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