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टीनेजर्स के नए दोस्त बने चैटबॉट्स! पर क्या ये इमोशनल डिपेंडेंसी बच्चों को असली रिश्तों से दूर कर रही है?

टेक्नोलॉजी की तेज़ रफ़्तार ने दैनिक जीवन के साथ – साथ बच्चों के जीवन में भी एक फिनोमेनल बदलाव ला दिया है, लेकिन साइंटिस्ट अब इसे ‘मेंटल हेल्थ क्राइसिस’ मान रहे हैं. रिसर्चर्स कि रिपोर्ट बताती है की टीनेजर्स द्वारा स्मार्टफोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का ओवरयूज़ उनके सोशल स्किल्स और इमोशनल डेवलपमेंट के लिए बहुत हानिकारक साबित हो रहा है.

AI कभी भी इमोशनल स्किल्स नहीं सिखा सकता!

आजकल, जहाँ बच्चे अक्सर अपने दोस्तों या माता-पिता से बात करने में झिझकते हैं, वही वो AI चैटबॉट्स जैसे ChatGPT उनके नए इमोशनल सपोर्ट सिस्टम बनने का काम कर रहे है.

टीनेजर्स AI की तरफ इसलिए खिंचे जा रहे हैं क्योंकि ये हमेशा एवलेबल रहते हैं और ये बिना किसी जजमेंट के आपकी बात सुनते हैं, चाहे वो कुछ भी हो. साइकोलॉजिस्ट्स की सबसे बड़ी चिंता ये है कि AI के साथ ये इमोशनल डिपेंडेंसी बच्चों को गहरे और सच्चे ह्यूमन कनेक्शन बनाने से रोक रहा है. AI साथी कभी भी इमोशंस, लाइफ स्ट्रगल्स या सोशल स्किल्स को नहीं समझा सकते.
एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि AI प्रोग्राम यूज़र्स को लगातार स्क्रीन से चिपकाए रखने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, और ये सेंसिटिव मुद्दों पर भी मिसलीडिंग या गलत इनफार्मेशन दे सकते हैं. नतीजन, टीनेजर्स अकेलेपन और सोशल आइसोलेशन के शिकार होते जा रहे हैं.

बच्चों के मेंटल हेल्थ के लिए जरुरी कदम!

रिसर्च से पता चला है कि आजकल बच्चों को उनका पहला स्मार्टफोन 11 से 12 साल की उम्र में ही मिल जा रहा है, जो हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार बहुत जल्दी है. साइंटिफिक रिपोर्ट्स कि 13 साल से कम उम्र पहले सोशल मीडिया और स्मार्टफोन का यूज़ शुरू करने वाले टीनेजर्स (खासकर लड़कियों) में डिप्रेशन, एंग्जायटी और मूड स्विंग्स जैसी मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम्स का रिस्क काफी हाई हो जाता है.

मेंटल हेल्थ स्पेशलिस्ट ने माता-पिता से आग्रह किया है कि वो अपने बच्चों को स्मार्टफोन देने में देरी करें. कुछ साइंटिस्ट ने तो यहाँ तक सुझाव दिया है कि बच्चों के लिए 13 साल से पहले स्मार्टफोन को उसी तरह रिस्ट्रिक्टेड किया जाना चाहिए जैसे शराब या तंबाकू को किया जाता है.
अगर बच्चों को कम्युनिकेशन की ज़रूरत है, तो पेरेंट्स को केवल कॉलिंग और टेक्स्टिंग तक ही सीमित एक ‘डंबफोन’ देना चाहिए. इसके साथ ही, घर में स्ट्रिक्ट ‘स्क्रीन टाइम लिमिट्स’ सेट करना बेहद ज़रूरी बताया है.

पेरेंट्स के लिए लास्ट मेसेज

स्पेशलिस्ट्स का कहना है कि टेक्नोलॉजी को पूरी तरह से हटाने के बजाए, इसे एक्टिवली मैनेज करना ज़रूरी है. पेरेंट्स को चाहिए कि वो बच्चों को सिर्फ गैजेट्स न दें, बल्कि उन्हें एक ज़िम्मेदार ‘डिजिटल सिटिज़न’ बनने की ट्रेनिंग भी दें. उनके ऑनलाइन एक्सपीरिएंसेज पर खुलकर और ईमानदारी से बात करें, और उन्हें ऑफ़लाइन सोशल एक्टिविटीज़ में शामिल होने के लिए मोटिवेट करें, ताकि वे टेक और लाइफ में सही बैलेंस बना सकें.

news desk

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