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क्या पार्टनर को खुद से कमतर समझना रिश्ते में पैदा कर सकता है दूरी? जानिए क्या है ‘डेटिंग डाउन’ और क्यों बढ़ रहा है इसका चलन

नई दिल्ली: रिश्तों में प्यार और आपसी समझ के साथ सम्मान भी बेहद जरूरी होता है। लेकिन क्या हो, जब दो लोगों में से कोई एक खुद को दूसरे से बेहतर समझने लगे? क्या कम कमाई, कम पढ़ाई या अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर किसी पार्टनर को कमतर आंकना रिश्ते में असंतुलन पैदा कर सकता है? सोशल मीडिया पर इन दिनों ‘डेटिंग डाउन’ शब्द चर्चा में है। यह सिर्फ किसी ऐसे व्यक्ति को डेट करने तक सीमित नहीं है, जिसे कुछ मामलों में खुद से कमतर माना जाए, बल्कि रिश्तों में बराबरी, आत्मसम्मान और आपसी अपेक्षाओं से जुड़े कई सवाल भी खड़े करता है।

आमतौर पर डेटिंग डाउन का इस्तेमाल ऐसे पार्टनर के लिए किया जाता है, जिसे रंग-रूप, आमदनी, शिक्षा या सामाजिक स्तर के लिहाज से अपने से नीचे माना जाता है। कुछ लोग इस शब्द का इस्तेमाल ऐसे रिश्तों के लिए भी करते हैं, जिनमें एक साथी दूसरे की तुलना में कम प्रयास करता है या भावनात्मक रूप से उपलब्ध नहीं रहता। लेकिन क्या किसी रिश्ते की गुणवत्ता इन पैमानों से तय की जा सकती है? इस विषय पर द इंडियन एक्सप्रेस ने मनोवैज्ञानिक डॉ. साक्षी मंध्यान से बातचीत की। उन्होंने समझाया कि स्वस्थ रिश्ता किसी रैंकिंग या तुलना से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और जिम्मेदारी से बनता है।

रिश्तों में अंतर और असंतुलन के बीच क्या है फर्क?

मनोवैज्ञानिक और मंध्यान केयर की संस्थापक डॉ. साक्षी मंध्यान के मुताबिक, ‘डेटिंग डाउन’ जैसे शब्द रिश्तों को एक तरह की रैंकिंग व्यवस्था में बदल सकते हैं। इससे यह धारणा बनती है कि आय, शिक्षा, पेशा या सुंदरता के आधार पर कोई एक पार्टनर दूसरे से बेहतर है। जबकि हकीकत यह है कि अलग-अलग पृष्ठभूमि के दो लोग भी एक-दूसरे के साथ बराबरी और सम्मान वाला रिश्ता बना सकते हैं।

डॉ. मंध्यान के अनुसार, रिश्ते में अंतर होना और असंतुलन होना दो अलग बातें हैं। उदाहरण के तौर पर, एक पार्टनर का दूसरे से कम कमाना सिर्फ एक अंतर है। लेकिन अगर वह अपनी जिम्मेदारियां निभाने से इनकार करता है, तो यह रिश्ते में असंतुलन की स्थिति बन सकती है।

इसी तरह, किसी व्यक्ति की औपचारिक शिक्षा कम होना अपने आप में समस्या नहीं है। परेशानी तब पैदा होती है, जब वह अपने साथी के विचारों को महत्व न दे या खुद में सुधार करने की इच्छा ही न रखे।

विशेषज्ञ के मुताबिक, दो लोगों के बीच तालमेल इस बात से तय होता है कि वे एक-दूसरे का सम्मान कैसे करते हैं, जिम्मेदारियां किस तरह निभाते हैं, मतभेदों को कैसे सुलझाते हैं और एक-दूसरे की भावनात्मक जरूरतों को कितना समझते हैं। रिश्ता तब अस्वस्थ होने लगता है, जब एक पार्टनर लगातार सारी कमियों की भरपाई करता रहे और दूसरा अपनी जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार न हो।

जब एक पार्टनर खुद को दूसरे से बेहतर समझने लगे

डॉ. मंध्यान बताती हैं कि जब किसी व्यक्ति के मन में यह विचार आने लगता है कि वह अपने मौजूदा साथी से बेहतर पार्टनर पा सकता था, तो रिश्ते का स्वरूप धीरे-धीरे बदलने लगता है। ऐसी सोच के बाद व्यक्ति अपने साथी की खूबियों और रिश्ते में उसके योगदान को समझने के बजाय उसकी कमियां गिनाने लगता है।

दूसरी ओर, जिस पार्टनर को लगता है कि उसका साथी उससे बेहतर है, वह भी खुद को साबित करने के दबाव में आ सकता है। उसे लग सकता है कि रिश्ते में बने रहने के लिए उसे लगातार अपनी काबिलियत दिखानी होगी।

यह असमानता हमेशा बड़े झगड़ों के रूप में सामने नहीं आती। कई बार इसका असर रोजमर्रा की बातचीत और फैसलों में दिखाई देने लगता है। खुद को बेहतर समझने वाला पार्टनर अपनी राय और सलाह को ज्यादा अहमियत देने लगता है। वहीं दूसरा साथी या तो हर बात पर अपना बचाव करने लगता है या फिर सामने वाले की स्वीकृति पाने के लिए जरूरत से ज्यादा कोशिश करता है।

हेल्दी रिश्ता बनाने के लिए किन बातों पर दें ध्यान?

विशेषज्ञ के मुताबिक, किसी रिश्ते को इस आधार पर नहीं आंकना चाहिए कि दोनों में से कौन ज्यादा कमाता है, किसकी शिक्षा बेहतर है या कौन सामाजिक रूप से ज्यादा सफल है। असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या दोनों पार्टनर एक-दूसरे को बराबर सम्मान देते हैं और क्या दोनों की बात सुनी जाती है।

हर रिश्ते में विचारों का अंतर और मतभेद होना सामान्य है। समस्या तब शुरू होती है, जब इन मतभेदों के आधार पर यह तय किया जाने लगे कि किसकी जरूरतें ज्यादा महत्वपूर्ण हैं और किसकी बात को नजरअंदाज किया जा सकता है।

एक स्वस्थ रिश्ते में दोनों पार्टनर को अपनी बात रखने, फैसलों में भागीदारी करने और अपनी भावनाएं जाहिर करने की बराबर जगह मिलनी चाहिए। किसी एक की कमाई, शिक्षा या सामाजिक स्थिति उसे दूसरे पर अधिकार नहीं देती।

इसलिए ‘डेटिंग डाउन’ जैसे शब्दों के आधार पर पार्टनर की कीमत तय करने के बजाय यह देखना ज्यादा जरूरी है कि रिश्ते में सम्मान, भरोसा, जिम्मेदारी और भावनात्मक सहयोग कितना है। आखिरकार, मजबूत रिश्ता इस बात से नहीं बनता कि दोनों में कौन बेहतर है, बल्कि इससे बनता है कि दोनों एक-दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।

vineet verma

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