ब्राजील के रियो में सबसे बड़ा खूनी ऑपरेशन
28 अक्तूबर का दिन ब्राजील के रियो डी जनेरियो के इतिहास में एक खौफनाक तारीख बन गया. शहर के कॉम्प्लेक्सो दा पेन्हा इलाके में पुलिस और संगठित अपराध के खिलाफ चले ‘ऑल-आउट’ अभियान में महज़ 24 घंटों में 64 लोगों की मौत हो गई. यह हिंसा इतनी भीषण थी कि संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने इसे ‘हॉरिफिक’ (डरावना) बताते हुए गहरी चिंता जताई है.
‘अंतर्राष्ट्रीय गिरोह’ के खिलाफ जंग या मानवाधिकारों पर चोट?
रियो डी जनेरियो के गवर्नर क्लाउडियो कास्त्रो ने बताया कि इस अभियान का लक्ष्य कुख्यात ड्रग तस्कर संगठन ‘कोमांडो वर्मेलो’ (Comando Vermelho) था, जो रियो की मलिन बस्तियों यानी फावेला से संचालित होता है. कास्त्रो ने कहा कि यह संगठन अब केवल स्थानीय नहीं रहा, बल्कि एक अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क के रूप में विकसित हो चुका है, जो ड्रग तस्करी, जबरन वसूली और अन्य अपराधों में शामिल है. उन्होंने इस ऑपरेशन को ‘कानून व्यवस्था की कार्रवाई’ नहीं बल्कि ‘युद्ध जैसी चुनौती’ बताया.
इस मुठभेड़ का एक नया और डराने वाला पहलू यह भी था कि अपराधियों ने पुलिस पर ड्रोन से हमले किए, जो संगठित अपराध की तकनीकी क्षमता को दर्शाता है. जवाबी कार्रवाई में चार पुलिसकर्मी भी मारे गए. इसके बाद गिरोह के सदस्यों ने शहर की सड़कों को ब्लॉक कर दिया और करीब 50 बसों को जबरन रोककर दहशत फैलाई.
UN मानवाधिकार कार्यालय ने इस घटना पर बयान जारी करते हुए पूछा है कि क्या यह अभियान “अतिरिक्त न्यायिक हत्या” (extrajudicial killing) का मामला है? संगठन ने ब्राजील सरकार से मांग की है कि वह अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों के तहत पारदर्शी, निष्पक्ष और त्वरित जांच सुनिश्चित करे.
यह सवाल तब और गंभीर हो जाते हैं जब रियो डी जनेरियो जल्द ही संयुक्त राष्ट्र के जलवायु सम्मेलन (COP30) से जुड़े कार्यक्रमों की मेजबानी करने जा रहा है. ब्राजील सरकार के लिए यह दोहरी चुनौती है — एक ओर अपराध पर नियंत्रण और दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों पर खरा उतरना. दुनिया की नज़र अब इस पर टिकी है कि ब्राजील इस ‘खूनी ऑपरेशन’ के बाद किस दिशा में कदम बढ़ाता है.
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