नई दिल्ली: नई दिल्ली में सोमवार को ऐसा सीन बना, जिसने सियासी हलकों में खूब कान खड़े कर दिए। जिस दिन चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) का प्रतिनिधिमंडल बीजेपी मुख्यालय पहुंचा, उसी दिन चीन ने जम्मू-कश्मीर की शक्सगाम घाटी को लेकर फिर से दावा ठोक दिया। हैरानी की बात ये रही कि दोनों खबरें एक साथ आने के बावजूद न तो बड़ा हंगामा हुआ और न ही कोई तीखी सरकारी प्रतिक्रिया दिखी। बस यहीं से सवाल उठने लगे—ये डिप्लोमेसी है या फिर सोच-समझकर चुनी गई चुप्पी?
12 जनवरी 2026 को CPC के अंतरराष्ट्रीय विभाग की उप-मंत्री सुन हैयान के नेतृत्व में चीनी डेलिगेशन बीजेपी दफ्तर पहुंचा। बीजेपी की तरफ से अरुण सिंह और विजय चौथाईवाले मौजूद थे। गलवान संघर्ष के बाद यह पहली बड़ी पार्टी-लेवल मीटिंग मानी जा रही है। चीन के राजदूत शू फेइहोंग की मौजूदगी ने भी इस मुलाकात को और “सीरियस” बना दिया।
उधर उसी दिन बीजिंग से बयान आया कि शक्सगाम घाटी चीन का इलाका है और वहां हो रहा निर्माण पूरी तरह जायज़ है। चीन ने इसे 1963 के चीन-पाक समझौते से जोड़ा और CPEC प्रोजेक्ट्स का बचाव किया। भारत पहले ही साफ कर चुका है कि शक्सगाम घाटी जम्मू-कश्मीर का हिस्सा है और ऐसा कोई समझौता उसे मंज़ूर नहीं।
इस पूरे मामले पर कांग्रेस ने मौके पर चौका मारते हुए सरकार को घेर लिया। कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने X पर लिखा,
“लद्दाख के बाद अब चीन शक्सगाम वैली तक कैसे घुस आया? CPEC के नाम पर कंस्ट्रक्शन चल रहा है और उधर बीजेपी नेता चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से मीटिंग कर रहे हैं—ये कैसी हिमाकत है?”
इतना ही नहीं, उन्होंने दूसरी पोस्ट में और तीखा तंज कसते हुए कहा,
“गलवान में हमारे जवान शहीद हुए, चीन लद्दाख में अतिक्रमण किए बैठा है, अरुणाचल में गांव बसा रहा है और यहां बीजेपी दफ्तर में गलबहियां चल रही हैं। मीडिया क्यों नहीं पूछ रहा—यह रिश्ता क्या कहलाता है?”
बीजेपी ने इसे सिर्फ “अंतर-पार्टी संवाद” बताया और शक्सगाम वाले मुद्दे पर ज़्यादा कुछ नहीं कहा। विदेश मंत्रालय ने भी बस इतना दोहराया कि भारत ने विरोध दर्ज करा दिया है।
अब बड़ा सवाल यही है—जब ज़मीन पर चीन लगातार दबाव बना रहा है, तो सियासत में इतनी ठंडक क्यों? ये रणनीति है या मजबूरी, इसका जवाब आने वाले दिनों में ही साफ़ होगा।