बिहार में HIV संक्रमण का खतरा धीरे-धीरे नहीं, बल्कि तेजी से फैल रहा है और चिंता की बात यह है कि इसे समय रहते रोकने के बजाय राज्य और केंद्र की स्वास्थ्य व्यवस्था इसे लगभग नजरअंदाज करती दिख रही है। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) के 2023 अनुमानों के अनुसार, बिहार में वयस्क HIV प्रिवेलेंस दर 0.16% है, जो भले ही राष्ट्रीय औसत 0.22% से कम हो, लेकिन कुल प्रभावित लोगों की संख्या 1.56 लाख से ज्यादा है।
राज्य में सक्रिय HIV मामलों की संख्या 97,046 तक पहुंच चुकी है और हर साल हजारों नए मामले जुड़ रहे हैं। सीतामढ़ी जिले में 7,400 से अधिक संचयी मामलों के सामने आने के बाद अब यह साफ हो गया है कि समस्या केवल एक जिले तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे बिहार में फैल चुकी है। मुजफ्फरपुर, सारण, समस्तीपुर, पटना और पूर्वी चंपारण जैसे जिलों में स्थिति और भी गंभीर होती जा रही है।
आंकड़े बता रहे हैं गंभीर हकीकत
NACO के 2023 डेटा के मुताबिक, बिहार में 68,000 से अधिक नए HIV संक्रमण दर्ज किए गए हैं। हालांकि यह संख्या 2010 के मुकाबले 44% कम बताई जाती है, फिर भी इतने बड़े पैमाने पर संक्रमण किसी भी तरह से राहत की खबर नहीं है। राज्य में 32 ART केंद्रों पर 97,046 सक्रिय मरीज मुफ्त दवाओं पर निर्भर हैं, लेकिन रोकथाम के प्रयास बेहद कमजोर हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराज्यीय पलायन, असुरक्षित यौन संबंध, सामाजिक कलंक और जन्मजात संक्रमण इसके मुख्य कारण हैं। 2019 के NACO अनुमानों के अनुसार, बिहार के 38 जिलों में से 12 जिले ‘हाई-लोड’ श्रेणी में हैं, जहां PLHIV की संख्या 5,000 से अधिक है। 2023 में बिहार के 11 जिलों में 200 से ज्यादा नए संक्रमण दर्ज हुए, जिनमें अकेले मुजफ्फरपुर में 1,347 नए मामले सामने आए।
सीतामढ़ी में 2012 से अब तक 7,948 संचयी मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें 4,958 मरीज अभी सक्रिय हैं। यहां 400 से ज्यादा बच्चे HIV से प्रभावित हैं, जिनमें अधिकांश को संक्रमण जन्म के समय माता-पिता से मिला। डॉक्टरों का कहना है कि जिले में पलायन दर 70% से अधिक है, लेकिन बाहर जाने वाले मजदूरों के लिए किसी तरह की प्री-डिपार्चर HIV स्क्रीनिंग व्यवस्था नहीं है। मुजफ्फरपुर, सारण, समस्तीपुर, पटना, दरभंगा और सीवान जैसे जिलों में भी संक्रमण की दर चिंताजनक स्तर पर है।
बच्चे, महिलाएं और सिस्टम की नाकामी
बिहार में HIV का सबसे खतरनाक पहलू बच्चों और महिलाओं में बढ़ते मामले हैं। अकेले सीतामढ़ी में 400 से अधिक बच्चे संक्रमित हैं, जबकि पूरे राज्य में यह संख्या हजारों में है। NACO के मुताबिक, 29% नए मामले वाणिज्यिक पार्टनर्स से जुड़े हैं। सरकार गर्भवती महिलाओं की 100% HIV स्क्रीनिंग का दावा करती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कवरेज केवल 60–70% तक ही सीमित है। सीतामढ़ी में महिलाओं के मामले पुरुषों से ज्यादा हैं, जो PMTCT यानी मां से बच्चे में संक्रमण रोकने वाले कार्यक्रम की विफलता की ओर इशारा करता है।
स्वास्थ्य मंत्री भले ही स्थिति को “नियंत्रित” बता रहे हों, लेकिन वायरल रिपोर्ट्स के बाद दिया गया स्पष्टीकरण यह सवाल खड़ा करता है कि अगर हालात काबू में हैं, तो नए मामले हर साल क्यों बढ़ रहे हैं। 32 ART केंद्रों पर लगभग एक लाख मरीजों का बोझ है, गांव-स्तर पर जांच कैंप नाममात्र के हैं और पलायन करने वाले जिलों में अनिवार्य HIV टेस्टिंग की कोई नीति नहीं है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर जागरूकता, स्कूल-स्तरीय यौन शिक्षा और बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग ड्राइव नहीं चलाए गए, तो बिहार जल्द ही HIV का बड़ा हॉटस्पॉट बन सकता है। सवाल साफ है—आंकड़े सामने हैं, खतरा भी दिख रहा है, फिर भी रोकथाम पर ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे?