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सत्ता का रीसेट, तारिक रहमान की वापसी और  ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ की नई लाइन — क्या बदलेगी दिल्ली-ढाका की केमिस्ट्री?

बांग्लादेश के 2026 आम चुनाव ने देश की राजनीति को पूरी तरह रीसेट कर दिया है। Bangladesh Nationalist Party यानी बीएनपी ने तारिक रहमान की अगुवाई में 300 में से करीब 211 सीटें जीतकर साफ बहुमत हासिल कर लिया। यह जीत सिर्फ एक चुनावी आंकड़ा नहीं, बल्कि शेख हसीना युग के बाद नए पावर सेंटर की वापसी है। 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले विद्रोह के बाद पहली बार इतना प्रतिस्पर्धी और अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण चुनाव हुआ, जिससे राजनीतिक स्थिरता की उम्मीद जगी है—हालांकि आर्थिक चुनौतियां अभी भी सामने खड़ी हैं।

विपक्ष की तस्वीर

इस बार Jamaat-e-Islami ने 69 सीटें जीतकर अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और मुख्य विपक्ष बनकर उभरी। लेकिन महिलाओं के मजबूत समर्थन ने बीएनपी को बढ़त दिलाई—यह साफ संकेत है कि जमात के सख्त इस्लामी एजेंडे को लेकर समाज में सतर्कता है। 2024 विद्रोह से निकली National Citizen Party (एनसीपी) को सिर्फ 6 सीटें मिलीं। जमात-एनसीपी गठबंधन कुल 77 सीटों तक सिमट गया। यानी जो ऊर्जा सड़कों पर दिखी, वह पूरी तरह वोट में कन्वर्ट नहीं हो पाई।

मतदान प्रतिशत 60% से नीचे रहा। वजह साफ है—Awami League पर प्रतिबंध। फिर भी प्रक्रिया शांतिपूर्ण रही, जिससे चुनाव की विश्वसनीयता बनी रही। दिलचस्प बात यह कि कुछ अवामी समर्थकों ने रणनीतिक रूप से बीएनपी को वोट दिया हो सकता है। अगर ऐसा है, तो भविष्य में दोनों खेमों के बीच कड़वाहट थोड़ी कम हो सकती है।

तारिक रहमान के सामने असली परीक्षा

17 साल के निर्वासन के बाद लौटे तारिक रहमान अब सिर्फ विजेता नहीं, जिम्मेदार शासक हैं। उन्हें सुशासन बहाल करना है, संवैधानिक सुधार लागू करने हैं और सबसे बड़ी बात—डगमगाती अर्थव्यवस्था को संभालना है। 2024 की अशांति से गारमेंट सेक्टर बुरी तरह प्रभावित हुआ था। महंगाई, बेरोजगारी और निवेशकों का भरोसा—तीनों को एक साथ संभालना आसान नहीं होगा। ऊपर से, अंतरिम सरकार के प्रस्तावित सुधारों को बीएनपी ने पहले अनिच्छा से स्वीकार किया था, जिससे पार्टी के भीतर मतभेद भी झलकते हैं।

भारत के लिए क्या मायने?

बांग्लादेश के 2026 चुनाव में सत्ता परिवर्तन का सीधा असर भारत और बांग्लादेश के रिश्तों पर पड़ना तय है। नई सरकार के नेतृत्व में नीति का स्वर थोड़ा बदल सकता है, लेकिन रिश्तों की बुनियाद पूरी तरह बदलने की संभावना कम है, क्योंकि दोनों देशों की आर्थिक और सुरक्षा जरूरतें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

सबसे बड़ा मुद्दा गंगा जल संधि का है, जिसका नवीनीकरण दिसंबर 2026 में होना है। बांग्लादेश में लंबे समय से यह धारणा रही है कि जल बंटवारे में उसे अपेक्षित हिस्सा नहीं मिलता। नई सरकार घरेलू राजनीतिक दबाव के कारण इस समझौते की शर्तों को फिर से बातचीत के लिए उठा सकती है। ऐसे में भारत को कूटनीतिक संतुलन रखते हुए बातचीत आगे बढ़ानी होगी, क्योंकि जल विवाद अक्सर भावनात्मक और राजनीतिक मुद्दा बन जाता है।

सीमा सुरक्षा और प्रबंधन

दूसरा अहम पहलू सुरक्षा और सीमा प्रबंधन का है। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच सीमा अपराध, अवैध घुसपैठ और सीमा पर होने वाली हिंसा को कम करने के लिए सहयोग बढ़ा था। नई सरकार अगर “बांग्लादेश फर्स्ट” नीति के तहत ज्यादा सख्त घरेलू रुख अपनाती है, तो सीमा मुद्दों पर बातचीत का तरीका बदल सकता है। हालांकि, व्यापार और कनेक्टिविटी परियोजनाओं के चलते दोनों देशों के लिए सहयोग जारी रखना ही व्यावहारिक विकल्प रहेगा।

क्षेत्रीय शक्ति संतुलन

तीसरा बड़ा पहलू क्षेत्रीय शक्ति संतुलन है। नई सरकार भारत के साथ रिश्ते बनाए रखते हुए चीन और अन्य देशों के साथ भी संतुलित संबंध रखना चाहती है। इसका मतलब यह है कि भारत को अब पहले से ज्यादा सक्रिय कूटनीति अपनानी होगी, ताकि बांग्लादेश में अपने आर्थिक और रणनीतिक हित मजबूत रख सके। खासकर पूर्वोत्तर भारत के लिए बांग्लादेश के बंदरगाह और ट्रांजिट मार्ग बेहद महत्वपूर्ण हैं, इसलिए स्थिर और सकारात्मक संबंध दोनों देशों की जरूरत बने रहेंगे।

कुल मिलाकर, यह चुनाव भारत के लिए चुनौती से ज्यादा अवसर भी है। अगर नई सरकार के साथ शुरुआती दौर में भरोसे और संवाद को मजबूत किया जाता है, तो व्यापार, कनेक्टिविटी और सुरक्षा सहयोग पहले से भी बेहतर स्तर पर जा सकता है। लेकिन जल बंटवारा, सीमा घटनाएं और घरेलू राजनीति जैसे मुद्दे समय-समय पर रिश्तों की परीक्षा लेते रहेंगे।

Gopal Singh

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