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हजारों साल पुराने क्यूनिफॉर्म बेबीलोनियन भजन को AI ने किया जिंदा —  क्या अब सिंधु लिपि की चुप्पी भी टूटने वाली है?

म्यूनिख की लुडविग मैक्सिमिलियन यूनिवर्सिटी की एक प्रयोगशाला में, 3,000 साल पुराना एक बेबीलोनियन भजन फिर से गुनगुनाने  लगा है. न कि मानव स्वरों से, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से. 30 मिट्टी की पट्टिकाओं पर बिखरे टुकड़ों को पढ़ने में प्रशिक्षित एआई ने टूटे हुए काव्य पंक्तियों को एक-एक शब्द, एक-एक अक्षर जोड़कर पुनर्जीवित किया. परिणाम? बेबीलोन के स्वर्ण युग की वैभवशाली प्रशंसा में रचा गया एक काव्यात्मक भजन, जो शहर की शान और उसके लोगों की महिमा गाता है.

यह कोई साइंस फिक्शन नहीं है… यह वास्तविकता है.

यह भजन लगभग 1000 ईसा पूर्व का है, जिसमें बेबीलोन शहर की सुंदरता, समृद्धि, फरात नदी की हरियाली, महिलाओं की पुरोहित भूमिकाएं और विदेशियों के प्रति आतिथ्य का काव्यात्मक वर्णन है. LMU और बगदाद विश्वविद्यालय की साझेदारी में, इलेक्ट्रॉनिक बेबीलोनियन लाइब्रेरी प्लेटफॉर्म ने क्यूनिफॉर्म लिपि के हजारों अंशों को डिजिटल किया, और AI ने दशकों का काम मिनटों में पूरा कर 250 पंक्तियों वाला पूरा भजन उकेरा.

प्रोफेसर एनरिक जिमेनेज़ की अगुवाई में हुई इस खोज ने साबित कर दिया कि AI अब सिर्फ भविष्य नहीं बना रहा—वह अतीत को भी पुनः लिख रहा है. क्यूनिफॉर्म लिपि के हजारों टुकड़ों को स्कैन कर, पैटर्न पहचान कर और खोए हुए संदर्भों को जोड़कर, एआई ने एक ऐसा गीत उकेरा जो सदियों से खामोश था. यह भजन सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं—यह एक सभ्यता की आत्मा है, जो मिट्टी से निकलकर फिर से जीवित हो गई.

लेकिन अगर बेबीलोन का रहस्य सुलझ गया, तो क्या अब भारत की सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) का रहस्य भी AI के हाथों खुलने वाला है?

सिंधु लिपि… एक अनसुलझा कोड !

लगभग 3300-1300 ईसा पूर्व की सिंधु घाटी सभ्यता दुनिया की सबसे उन्नत शहरी सभ्यताओं में से एक थी. हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा—ये शहर नालियों, स्नानघरों और सुनियोजित सड़कों वाले थे. लेकिन हमारा दुर्भाग्य ये है कि इतनी उन्नत सभ्यता के वंशज होते हुए भी हमें उनके बारे में कुछ नहीं पता कौन थे वो लोग, कहाँ से आये थे ? आखिर उस ज़माने में इतनी उन्नत टेक्नोलॉजी का ज्ञान उन्हें किसने दिया ? और सबसे अहम प्रश्न वह कौन सी भाषा बोलते थे? इनकी लिपि आज तक पढ़ी नहीं जा सकी है. जो हमें अभी तक मिला है वो प्रतीकात्मक भाषा की तरफ इशारा करता है पर उनका अर्थ आज तक डिकोड नहीं हो सका.

लगभग 4,000 मुहरों और शिलालेखों पर उकेरे गए छोटे-छोटे चिह्न—औसतन 5 से 7 प्रतीक प्रति पंक्ति—किसी रहस्यमयी कोड की तरह हैं. कोई द्विभाषी पत्थर (जैसे रोसेटा स्टोन) नहीं मिला. कोई लंबा ग्रंथ नहीं. बस टूटे-फूटे संकेत, जो व्यापार, धर्म या शासन की बात कर रहे हों—या शायद कुछ और!

सिन्धु कालीन मुहरें

पिछले 100 सालों से पुरातत्वविद, भाषाविद और गणितज्ञ इसे सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन अब टेक्नोलॉजी का युग आ गया है तो कुछ उम्मीदें भी जगी हैं. अब इसका उत्तर ढूँढने के लिए आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस का प्रयोग किया जा रहा है.

पारंपरिक शोध दशकों से तो चल ही रहा था, लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने इसमें क्रांति ला दी है. AI ने पैटर्न रिकग्निशन, मशीन लर्निंग, न्यूरल नेटवर्क्स और जेनरेटिव मॉडल्स की मदद से लिपि को आंशिक रूप से समझने योग्य बना दिया है. अभी तक पूर्ण डिकोडिंग तो नहीं हुई, लेकिन प्रगति जबरदस्त है. इस लेख में हम AI की मुख्य खोजों को सरल भाषा में समझाएंगे.

राजेश राव का AI डेटाबेस और टूल्स

राजेश राव, जो वॉशिंगटन विश्वविद्यालय (University of Washington) से जुड़े एक कंप्यूटर साइंटिस्ट और ब्रेन रिसर्चर हैं, ने सिंधु घाटी लिपि को समझने के लिए AI की मदद ली. उन्होंने Markov Models और Deep Learning (CNN) जैसे AI टूल्स का इस्तेमाल किया. इन टूल्स की मदद से उन्होंने 700 से ज्यादा शिलालेखों की फोटो लीं और एक डिजिटल डेटाबेस तैयार किया, जिसमें हर चिह्न को नंबर देकर सीक्वेंस में विश्लेषित किया गया.

भाषाई संरचना की पुष्टि

इस शोध के मुख्य नतीजे दो थे. पहला, AI ने साबित किया कि सिंधु लिपि कोई रैंडम चित्र नहीं, बल्कि एक असली भाषाई संरचना वाली है. इसके लिए एंट्रोपी (अनिश्चितता का मीटर) मापा गया, जो 4.5 से 5 बिट्स प्रति चिह्न निकला – यह संस्कृत या अंग्रेजी जैसी आधुनिक भाषाओं से मिलता-जुलता है. दूसरा, 2023 में अपडेटेड शोध में AI ने 417 अद्वितीय चिह्नों को 20 ग्रुप्स में क्लस्टर किया, जैसे पशु चिह्नों का एक ग्रुप, बर्तनों का दूसरा, और ज्यामितीय आकारों का तीसरा.

राजेश राव का एन्ट्रापी मेथड

इस क्लस्टरिंग को विजुअल रूप से समझें तो AI ने समान दिखने वाले चिह्नों को परिवारों में बांटा, जैसे यूनिकॉर्न, बैल और हाथी एक ग्रुप में, जबकि जार, पॉट और बाउल दूसरे में. यह काम CNN की मदद से हुआ, जो फोटो में पैटर्न पहचानता है. कुल मिलाकर, राजेश राव का यह शोध बताता है कि सिंधु लिपि व्यापार रसीदें या नाम हो सकती है, और AI ने इसे अपठनीय से आंशिक रूप से समझने योग्य बना दिया है.

Indus Script Decoder  प्रोजेक्ट: AI से पैटर्न समझने में सहायता

बहुराष्ट्रीय प्रोजेक्ट Indus Script Decoder (2018–2024) एक अहम AI-आधारित पहल थी, जिसमें IIT गांधीनगर, MIT और Hebrew University की संयुक्त टीमों ने काम किया. इस प्रोजेक्ट में CNN, RNN और Transformer जैसे उन्नत AI मॉडल्स का उपयोग करते हुए 3,800 से अधिक डिजिटाइज्ड मुहरों का बड़ा डेटासेट तैयार किया गया. शोध में पाया गया कि AI ने चिह्नों की पहचान में 92% की सटीकता हासिल की, जिससे मुहरों पर उकेरे गए प्रतीकों को पहचानना अधिक सरल हो गया. दिशा-विश्लेषण में यह सामने आया कि लगभग 85% शिलालेख दाएं से बाएं (RTL) लिखे गए हैं. व्याकरणिक पैटर्न में

हड़प्पा की मुहर जिसपर यूनिकॉर्न का सिंबल अंकित है

“यूनिकॉर्न” प्रतीक अक्सर शिलालेख के अंत में पाया गया, जो संभवतः किसी नाम या शीर्षक का संकेत हो सकता है. द्रविड़ संबंध की जांच में सिंधु लिपि के 15% चिह्न तमिल-ब्राह्मी लिपि से मेल खाते पाए गए, जिससे द्रविड़ मूल की संभावना और मजबूत होती है. समग्र रूप से देखा जाए तो AI अब ऐसी सिंथेटिक मुहरें भी जनरेट कर सकता है, जो असली जैसी दिखती हैं और पुरातत्वविदों को पैटर्न और संरचना समझने में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करती हैं.

लेकिन… अर्थ अभी भी गायब है

प्रतीक पहचानना एक बात है, अर्थ समझना दूसरी. एआई बता सकता है कि “यह मछली का चिह्न है, यह 47 बार दोहराया गया”, लेकिन यह शब्द है? ध्वनि? संख्या? व्यापारिक चिह्न? या देवता का नाम? इसका जवाब अभी तक नहीं है.

शिलालेख बहुत छोटे हैं. कोई वाक्य नहीं. कोई कहानी नहीं. और सबसे बड़ी समस्या—कोई संदर्भ नहीं. बेबीलोन में क्यूनिफॉर्म के लाखों दस्तावेज थे, जिनसे एआई ने सीखा, पर सिंधु लिपि के पास सिर्फ 4,000 छोटे टुकड़े हैं, जिनमें से कई क्षतिग्रस्त.

फिर भी, उम्मीद बाकी है…

तमिलनाडु के सीएम का 1 मिलियन डॉलर के इनाम की घोषणा

फरवरी 2025 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने घोषणा की: जो कोई सिंधु लिपि को डिकोड कर देगा, उसे 1 मिलियन डॉलर का पुरस्कार मिलेगा. इस घोषणा के बाद दुनिया भर के एआई विशेषज्ञ, भाषाविद और स्टार्टअप्स ने रुचि दिखाई. कुछ द्रविड़ भाषाओं से समानता ढूंढ रहे हैं, कुछ इंडो-आर्यन से. कुछ एआई को प्रोटो-लिपियों से तुलना करने के लिए प्रशिक्षित कर रहे हैं.

भविष्य क्या है?

बेबीलोन के भजन की खोज साबित करता है कि एआई प्राचीन ग्रंथों को पुनर्जीवित कर सकता है. सिंधु घाटी में अभी पूरा अनुवाद नहीं हुआ, लेकिन डिजिटलाइजेशन, पैटर्न विश्लेषण और वैश्विक सहयोग की नींव पड़ चुकी है.

विशेषज्ञ आस्को पारपोला कहते हैं, “यह दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण अपठनीय लिपि है. अगर इसे पढ़ लिया गया, तो मानव इतिहास का एक पूरा अध्याय फिर से लिखा जाएगा.”

शायद अगले दशक में, किसी भारतीय गांव में खुदाई के दौरान मिली एक नई मुहर, एआई के डेटाबेस से जुड़कर, पहली बार कहेगी:

“हम थे. हमने बनाया. हमारा नाम था…” और तब सिंधु घाटी फिर से जी उठेगी!

news desk

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