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मणिपुर में क्यों नहीं थम रहा हिंसा का दौर? जमीन, ST दर्जा और राजनीतिक वर्चस्व ने कैसे बढ़ाई मैतेई-कुकी-नगा के बीच दूरी

मणिपुर में जारी जातीय तनाव को समझने के लिए सिर्फ मौजूदा हिंसा को देखना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे जमीन के अधिकार, अनुसूचित जनजाति (ST) दर्जे की मांग, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पहाड़ी-घाटी की अलग-अलग सामाजिक संरचना जैसे कई पुराने मुद्दे जुड़े हैं।

पूर्वोत्तर भारत का मणिपुर पिछले तीन वर्षों से अधिक समय से जातीय हिंसा और सामाजिक तनाव से जूझ रहा है। शांति बहाली की कोशिशों के बावजूद मैतेई, कुकी और नगा समुदायों के बीच अविश्वास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इस संकट की सबसे बड़ी वजहों में जमीन और संसाधनों पर अधिकार, संवैधानिक पहचान तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े सवाल शामिल हैं।

मणिपुर की सामाजिक तस्वीर को समझना जरूरी

मणिपुर की आबादी और भूगोल दो अलग तस्वीरें पेश करते हैं। राज्य का बड़ा हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र है, जहां मुख्य रूप से कुकी और नगा समेत कई जनजातीय समुदाय रहते हैं। वहीं इंफाल घाटी मैतेई समुदाय का प्रमुख क्षेत्र है।

2011 की जनगणना के अनुसार मैतेई समुदाय राज्य की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा है। दूसरी ओर, कुकी और नगा समुदायों की बड़ी आबादी पहाड़ी जिलों में रहती है। यही भौगोलिक विभाजन आगे चलकर जमीन, प्रशासन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े विवादों को प्रभावित करता है।

पहाड़ी और घाटी का फर्क क्यों बना बड़ा मुद्दा?

मणिपुर में जमीन से जुड़े कानूनों की व्यवस्था पहाड़ी और घाटी क्षेत्रों को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करती है। जनजातीय पहाड़ी इलाकों में जमीन के हस्तांतरण को लेकर विशेष कानूनी सुरक्षा मौजूद है।

मैतेई समुदाय लंबे समय से यह सवाल उठाता रहा है कि राज्य की बड़ी आबादी के पास भौगोलिक रूप से सीमित क्षेत्र है, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में बाहरी बसावट और जमीन के अधिकार से जुड़े नियम अलग हैं।

वहीं कुकी और नगा समुदायों की ओर से यह चिंता जताई जाती रही है कि यदि पहाड़ी जमीन पर मौजूदा सुरक्षा कमजोर हुई तो उनकी पारंपरिक भूमि और संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है।

ST दर्जे का विवाद कैसे बना हिंसा का बड़ा कारण?

मणिपुर के मौजूदा संकट में अनुसूचित जनजाति दर्जे का मुद्दा भी बेहद महत्वपूर्ण है। कुकी और नगा पहले से ही अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल हैं, जबकि मैतेई समुदाय को ST सूची में शामिल नहीं किया गया है।

मैतेई समुदाय की ओर से लंबे समय से ST दर्जे की मांग उठती रही है। 2023 में मणिपुर हाईकोर्ट के एक आदेश के बाद इस मुद्दे ने बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद पैदा किया। बाद में अदालत के उस आदेश को लेकर भी स्थिति स्पष्ट हुई, लेकिन तब तक जमीन और पहचान से जुड़ी आशंकाएं काफी गहरी हो चुकी थीं।

कुकी और नगा संगठनों ने आशंका जताई कि मैतेई को ST दर्जा मिलने से पहाड़ी जमीन, सरकारी नौकरियों और अन्य संवैधानिक संरक्षणों पर उनका अधिकार प्रभावित हो सकता है।

मैतेई समुदाय का राजनीतिक प्रभाव

मणिपुर विधानसभा में 60 सीटें हैं, जिनमें बड़ी संख्या इंफाल घाटी के विधानसभा क्षेत्रों की है। मैतेई समुदाय की बड़ी आबादी घाटी क्षेत्र में केंद्रित होने के कारण राज्य की चुनावी राजनीति में उसका प्रभाव महत्वपूर्ण रहा है।

यही राजनीतिक असमानता का सवाल भी विवाद का हिस्सा है। एक तरफ मैतेई समुदाय अपनी बड़ी आबादी के बावजूद सीमित भौगोलिक क्षेत्र और जमीन से जुड़े प्रतिबंधों की बात करता है, वहीं जनजातीय समुदाय अपनी जमीन और संवैधानिक सुरक्षा को कमजोर किए जाने की आशंका व्यक्त करते हैं।

कुकी और नगा के रिश्ते भी हमेशा आसान नहीं रहे

मणिपुर का मौजूदा संघर्ष केवल मैतेई बनाम कुकी या मैतेई बनाम नगा के रूप में समझना भी अधूरा होगा। कुकी और नगा समुदायों के बीच भी लंबे समय से जमीन और राजनीतिक प्रभाव को लेकर टकराव रहा है।

1990 के दशक में दोनों समुदायों के बीच गंभीर हिंसक संघर्ष हुआ था। इसलिए पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले विभिन्न जनजातीय समूहों के बीच भी राजनीतिक और क्षेत्रीय हित पूरी तरह समान नहीं हैं।

हालांकि, मैतेई समुदाय के साथ मौजूदा संघर्ष ने कई मुद्दों पर कुकी और नगा संगठनों के बीच साझा चिंताओं को भी सामने ला दिया है।

असली सवाल सिर्फ जमीन का नहीं, पहचान का भी

मणिपुर संकट में जमीन का सवाल सीधे सामुदायिक पहचान और राजनीतिक सुरक्षा से जुड़ जाता है। मैतेई समुदाय जहां अपने लिए अधिक भूमि अधिकार और संवैधानिक सुरक्षा की मांग करता है, वहीं कुकी और नगा समुदाय मौजूदा जनजातीय संरक्षण को अपनी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार मानते हैं।

इसी वजह से किसी एक कानून या एक फैसले से इस पूरे विवाद का समाधान आसान नहीं है। जमीन, ST दर्जा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

शांति बहाली के सामने सबसे बड़ी चुनौती

मणिपुर में स्थायी शांति के लिए केवल हिंसा रोकना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। विस्थापित लोगों की वापसी, सुरक्षा की गारंटी, जमीन और संपत्ति से जुड़े विवाद, राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास बहाली जैसे सवाल भी महत्वपूर्ण हैं।

जब तक मैतेई, कुकी और नगा समुदायों की सुरक्षा और राजनीतिक हितों को लेकर बनी आशंकाओं पर संवाद नहीं होता, तब तक मणिपुर के संकट की जड़ें बनी रहने की संभावना पर चर्चा जारी रहेगी।

news desk

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