अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आर्कटिक क्षेत्र के ग्रीनलैंड पर कब्जा करने का पूरा मन बना चुके हैं और सोशल मीडिया पर हर दिन अपने इरादे जाहिर कर रहे हैं। इसके अलावा, ट्रंप ईरान को भी निशाना बनाना चाहते हैं और इसके लिए उनका फुल प्रूफ प्लान तैयार है। कहा जा रहा है कि एक से तीन दिन के अंदर ईरान को टारगेट किया जा सकता है, लेकिन ग्रीनलैंड पर उनका ध्यान स्थिर है।
इतना ही नहीं, अगर यूरोप के देशों से टकराव करना पड़े तो इसके लिए भी ट्रंप पूरी तरह तैयार हैं। ग्रीनलैंड को लेकर इतिहास में देखें तो अमेरिका पिछले 200 सालों से इस पर कब्जा करने की कोशिश कर रहा है।
नॉर्वे और डेनमार्क के बीच 434 साल पुरानी संधि टूटने के बाद अमेरिका की निगाह ग्रीनलैंड पर गई। 1814 की कील संधि के तहत नॉर्वे डेनमार्क से अलग हो गया, लेकिन ग्रीनलैंड उनके पास रह गया। अब ट्रंप ने साफ कहा है कि वे इसे अमेरिका में शामिल करना चाहते हैं। इस कदम से यूरोप में हलचल बढ़ सकती है। कहा जा रहा है कि अगर यूरोपीय देश अमेरिका को रोकते हैं, तो दुनिया में तीसरे विश्व युद्ध की आशंका पैदा हो सकती है।
2019 में ट्रंप ने पहली बार ग्रीनलैंड पर कब्जे की इच्छा जताई थी। वेनेजुएला के बाद दूसरे कार्यकाल में उन्होंने इसे अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया। अमेरिकी राष्ट्रपति एंड्रयू जैक्सन ने 1832 में इसे खरीदने का प्रस्ताव रखा था। अमेरिका लगातार अपने क्षेत्र का विस्तार करना चाहता रहा है और लुइसियाना परचेज और मुनरो डॉक्ट्रिन के तहत दूसरे देशों के इलाकों और द्वीपों पर कब्जे की होड़ में शामिल रहा।
अलास्का और ग्रीनलैंड पर अमेरिका की रणनीति
अलास्का का अधिग्रहण
अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम सेवर्ड ने 1867 में अलास्का खरीदने की घोषणा की। अलास्का पर कब्ज़ा करने का उद्देश्य कनाडा पर दबाव डालकर उसे अमेरिका में शामिल करना था। हालांकि, ब्रिटेन और कई यूरोपीय देश इसका विरोध कर रहे थे।
प्रथम विश्व युद्ध से पहले प्रयास
अमेरिका ने ग्रीनलैंड और डेनिश वेस्ट इंडीज को खरीदने की कोशिश की ताकि सामरिक समुद्री क्षेत्रों पर नियंत्रण पाया जा सके और उन्हें जर्मनी के खिलाफ सैन्य अड्डों के रूप में इस्तेमाल किया जा सके। 31 मार्च 1917 को डेनिश वेस्ट इंडीज अमेरिका को सौंपा गया, लेकिन ग्रीनलैंड पर डेनमार्क के कब्जे को मान्यता देने से अमेरिका ने इनकार कर दिया।
द्वितीय विश्व युद्ध में प्रयास
द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत में अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की योजना बनाई। अप्रैल 1940 में नाजियों ने डेनमार्क पर कब्ज़ा किया, लेकिन ग्रीनलैंड पर नहीं। अमेरिका ने नुउक में वाणिज्यिक दूतावास खोलकर अपने इरादे जाहिर किए। डेनमार्क ने 1941 में नाजी खतरे के डर से अमेरिका को वहां सैन्य अड्डा बनाने की अनुमति दे दी।
हिटलर की हार के बाद 1946 में अमेरिका ने ग्रीनलैंड खरीदने का प्रस्ताव रखा, लेकिन डेनमार्क ने इसे अस्वीकार कर दिया। उस समय डेनमार्क के लिए नाजी का खतरा तो नहीं था, लेकिन सोवियत संघ के कब्जे का डर उसे सताता रहा।
शीत युद्ध और बाद का दौर
शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव बढ़ा। अमेरिका ने ग्रीनलैंड को रणनीतिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना और 1951 में पिटुफिक स्पेस बेस स्थापित किया। यह基地 नाटो के उत्तरी ढाल का हिस्सा था। 1957 में डेनमार्क ने इसे परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र घोषित किया, लेकिन अमेरिकी परमाणु हथियार वहां रखे गए।
सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका थोड़े समय के लिए शांत हुआ, लेकिन रूस के यूक्रेन पर हमले और चीन की समुद्री विस्तारवादी नीतियों ने अमेरिका को फिर से ग्रीनलैंड पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मजबूर किया। ट्रंप का कहना है कि चीन और रूस इस आर्कटिक इलाके पर नजर रखते हैं।
ट्रंप का नया अभियान
ट्रंप की पहली सरकार में 2019 में विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने आर्कटिक काउंसिल में ग्रीनलैंड खरीदने का प्रस्ताव रखा था। अमेरिका ने चेतावनी दी कि आर्कटिक में केवल पर्यावरण और विज्ञान के नाम पर ही नहीं, बल्कि सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टि से भी ध्यान देना जरूरी है।
अब ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर कब्जे की योजना फिर से शुरू कर दी है। उन्होंने वहां के हर नागरिक को 1 मिलियन डॉलर देने का प्रस्ताव रखा और सैन्य तैनाती बढ़ा दी।
अमेरिका का मानना है कि अगर ग्रीनलैंड पर उसका नियंत्रण नहीं रहा, तो रूस और चीन जैसे देश इस क्षेत्र में अपने कदम बढ़ा सकते हैं। डोनाल्ड ट्रंप इसे रोकने के लिए किसी भी स्थिति में ग्रीनलैंड को अमेरिकी कब्जे में लाना चाहते हैं।
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