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बिहार चुनाव में लालगंज पर टिकी है सबकी नजरें! कितना सफल रहेगा  मुन्ना शुक्ला के सहारे चला गया तेजस्वी यादव  का दांव?

इतिहास की ओर चलें तो आज से लगभग 3 हजार साल पहले (करीब 400 ईसा पूर्व) जब पूरी दुनिया राजतंत्र से नियंत्रित हो रही थी. तब वैशाली सत्ता, राजनीति और धर्म के नये दर्शन से दुनिया को संदेश दे रही थी. 16 महाजनपदों में बंटे भारत का वैशाली, ‘गणराज्य’ के नाम से इसलिए मशहूर हुआ क्योंकि यहां सत्ता वंशानुगत न होकर प्रतिनिधियों द्वारा चुने हुए राजा से संचालित होती थी. 3 हजार साल के सफर में वैशाली का रूप रंग और क्षेत्रफल भले ही बदल गया हो लेकिन सत्ता और राजनीति के चरित्र में कुछ ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है. आज जब बिहार में 2025 का विधानसभा चुनाव हो रहा है तो वैशाली जनपद जिसका मुख्यालय हाजीपुर है, की एक विधानसभा सीट लालगंज चर्चा का केन्द्र बनी हुई है.

चर्चा सिर्फ इस बात को लेकर नहीं है कि लालगंज में आरजेडी और कांग्रेस की फ्रेंडली फाइट हो सकती है. बल्कि चर्चा यहां से उतरीं आरजेडी उम्मीदवार शिवानी शुक्ला को लेकर भी है. क्योंकि शिवानी अपने पिता की राजनीतिक विरासत की नई वाहक बन कर मैदान में आई है. शिवानी, लालगंज के पूर्व विधायक विजय कुमार शुक्ला ऊर्फ मुन्ना शुक्ला की बेटी हैं.  

साल 2000 में जेल में रहते हुए मुन्ना शुक्ला ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर यहां से अपने सियासी सफर का आगाज किया था. जिसके बाद अगले 10 साल तक ये सीट उनके ही पास रही. इन जीतों से मुन्ना शुक्ला ने लालगंज को अपना सुरक्षित गढ़ बना लिया. मुन्ना शुक्ला एलजेपी और जेडीयू दोनों पार्टियों से जुड़े रहे जो आज आरजेडी का हिस्सा हैं. मुन्ना शुक्ला की अहमियत सिर्फ लालगंज तक सीमित नहीं है. उनका और उनके परिवार का रसूख पूरे तिरहूत मंडल में करीब 4 दशक से मौजूद हैं.

जब गैंगवार से दहला था बिहार!

ये कहानी शुरू होती है 80 के दशक में, जब मूलरूप से वैशाली के खंजाहचक गांव का शुक्ला परिवार मुजफ्फरपुर के सियासी समीकरण का एक अहम केन्द्र बन गया था. दूसरा केन्द्र बृज बिहारी प्रसाद थे. जाहिर है इनके बीच का टकराव ही गैंगवार का कारक माना गया. हितों का टकराव सिर्फ राजनीतिक हो ऐसा भी नहीं है. यहां ठेके और सामाजिक वर्चस्व की भावना भी मौजूद थी. 1986 में चंदेश्वर सिंह पर हमले से शुरू हुई एक घटना ने उस गैंगवार का रूप ले लिया. जिसमें मिनी नरेश, अशोक सम्राट और कौशलेन्द्र शुक्ला ऊर्फ छोटन शुक्ला बड़े किरदार बन कर उभरे. माना जाता है कि बिहार में पहली बार एके 47 का इस्तेमाल भी इसी गैंगवार का नतीजा था. 90 का दशक आते आते छोटन शुक्ला और बृजबिहारी प्रसाद आमने सामने आ गए. बृज बिहारी प्रसाद तब आरजेडी के विधायक थे. 4 दिसंबर 1994 को छोटन शुक्ला और 1997 में उनके भाई भुटकुन शुक्ला की हत्या हुई जिसका आरोप बृज बिहारी प्रसाद पर लगा. इसके ठीक बाद 1998 में पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में बृज बिहारी प्रसाद की हत्या हुई जिसमें कई लोग आरोपी थे. उसमें छोटन शुक्ला के भाई मुन्ना शुक्ला का नाम भी शामिल था. मोटे तौर पर बृज बिहारी प्रसाद की हत्या के बाद ये गैंगवार तो खत्म हो गया लेकिन इसका स्वरूप बदल कर पॉलिटिकल हो गया.

आज की राजनीति में बृज बिहारी प्रसाद की पत्नी रमा देवी बीजेपी की सांसद हैं और मुन्ना शुक्ला की बेटी आरजेडी की उम्मीदवार हैं. राजनीतिक विश्लेषक प्रियदर्शी रंजन के मुताबिक ‘रमा देवी कभी राजद में हुआ करती थी और आज मुन्ना शुक्ला राजद में हैं. असल में हाल के वर्षों में भाजपा के भीतर या यूं कहिए कि पूरे बिहार एनडीए के भीतर वैश्य राजनीति बहुत मजबूत हुई है. ऐसे में भाजपा के भीतर रामदेवी की मजबूत एंट्री के बाद मुन्ना शुक्ला के लिए एनडीए के किसी भी घटक दल में रहना मुश्किल हो गया था. दिलचस्प है कि दोनों को विपरीत धाराओं की पार्टियों ने खूब तरजीह दिया है. राजद विगत कुछ समय से ए टू जेड पार्टी बनने की कवायद कर रही है. ए टू जेड पार्टी बनने के लिए जरूरी है कि सांकेतिक तौर पर ही सही चुनाव के दौरान टिकट बंटवारे में सभी जातियों को हिस्सेदारी मिले. इस लिहाज से ही मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला राजद को टिकट दिया गया है’.

लालगंज का जातीय समीकरण

लालगंज सीट को भूमिहार बहुल माना जाता है. लेकिन यहां राजपूत और वैश्य भी अच्छी संख्या में हैं. इनके बाद यादव और मल्लाह भी निर्णायक हैं. अनुसूचित जातियां करीब 20 फीसदी और मुसलमान 8 फीसदी के करीब हैं.

राजनीतिक विश्लेषक अतुल शंकर कहते हैं कि ‘लालगंज में निश्चित तौर पर शिवानी शुक्ला भूमिहारों का बड़ा हिस्सा पाने में कामयाब रहेंगी. क्योंकि बृज बिहारी प्रसाद की हत्या मामले में मुन्ना शुक्ला को सजा मिलना उन्हे सहानुभूति दिलाएगा. वहीं आरजेडी का कैडर वोट उनकी स्थिति मजबूत करेगा. लेकिन बीजेपी उम्मीदवार अगर भमिहार वोट में सेंध लगाने में कामयाब रहे और कांग्रेस के उम्मीदवार अपनी उपस्थिति दर्ज करा ले गए तो चुनाव काटें का हो जाएगा’.

फिलहाल लालगंज का मुकाबला दिलचस्प बन गया है. साल 2000 में पहली बार लालगंज से जीत का स्वाद चखने वाली बीजेपी ने एक बार फिर संजय कुमार सिंह पर ही दांव खेला है. हैविवेट उम्मीदवारों के चलते लालगंज सीट चर्चा में तो है ही सबकी नजरें भी टिकी हुई हैं. क्योंकि लालगंज के नतीजों पर न सिर्फ मुन्ना शुक्ला का भविष्य निर्भर करेगा बल्कि आरजेडी की बदलती राजनीति जिसे तेजस्वी ‘ए टू जेड’ कहते हैं उसपर पर भी असर पड़ेगा.   

Sandeep pandey

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