लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी गठबंधन के भीतर सियासी समीकरणों को लेकर हलचल तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान जारी है। कांग्रेस जहां बराबरी के आधार पर सीटों के बंटवारे की मांग कर रही है, वहीं गठबंधन में नए राजनीतिक दलों और नेताओं की एंट्री को लेकर भी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। इसी बीच समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसने गठबंधन की राजनीति में नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
कुछ दिन पहले अपनी जनता पार्टी के अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मुलाकात के दौरान स्वामी प्रसाद मौर्य ने इंडिया गठबंधन में शामिल होने की इच्छा जताई थी। बताया जा रहा है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश में 10 विधानसभा सीटों की मांग भी रखी है। इस घटनाक्रम के बाद उनके गठबंधन में शामिल होने की अटकलें तेज हो गई थीं।
स्वामी प्रसाद मौर्य के इंडिया गठबंधन में शामिल होने को लेकर जब पत्रकारों ने अखिलेश यादव से सवाल किया तो सपा प्रमुख ने साफ शब्दों में अपनी स्थिति बता दी। पत्रकारों ने पूछा कि स्वामी प्रसाद मौर्य दिल्ली जा रहे हैं, क्या वह भी उत्तर प्रदेश में इंडिया गठबंधन का हिस्सा बनेंगे?
इस पर अखिलेश यादव ने कहा, “हमारे गठबंधन में वह शामिल नहीं हो सकते हैं। हमारी सीट की गिनती में वह नहीं शामिल हो सकते हैं। आप क्यों बेवजह का बहस छेड़ रहे हो।”
अखिलेश के इस बयान से साफ संकेत मिल गया है कि फिलहाल समाजवादी पार्टी स्वामी प्रसाद मौर्य को अपने गठबंधन का हिस्सा बनाने के पक्ष में नहीं है। हालांकि, कांग्रेस की ओर से अभी तक इस बारे में कोई स्पष्ट रुख सामने नहीं आया है कि मौर्य को इंडिया गठबंधन में शामिल किया जाएगा या नहीं।
स्वामी प्रसाद मौर्य की राहुल गांधी से मुलाकात के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनके अगले कदम को लेकर चर्चाएं तेज हुई थीं। माना जा रहा था कि वह 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। लेकिन अखिलेश यादव के ताजा बयान ने इन अटकलों को झटका दिया है।
अब राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या अखिलेश यादव का यह बयान कांग्रेस नेतृत्व, खासकर राहुल गांधी के लिए कोई सियासी संदेश है? दरअसल, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच पहले से ही सीटों को लेकर सहमति बनाने की चुनौती बनी हुई है। ऐसे में किसी नए दल या नेता को गठबंधन में शामिल करने का फैसला दोनों दलों के बीच नए समीकरण पैदा कर सकता है।
स्वामी प्रसाद मौर्य का समाजवादी पार्टी से पुराना राजनीतिक रिश्ता रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने कुछ नेताओं के साथ भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थामा था। उस समय अखिलेश यादव ने उन्हें और उनके साथ आए नेताओं को चुनाव मैदान में उतारा था। हालांकि, इस राजनीतिक कदम से पार्टी को अपेक्षित चुनावी फायदा नहीं मिला।
बाद में अखिलेश यादव ने स्वामी प्रसाद मौर्य को विधान परिषद भी भेजा था। लेकिन हिंदू धर्म को लेकर उनकी विवादित बयानबाजी के बाद समाजवादी पार्टी के भीतर ही उनके खिलाफ आवाजें उठने लगी थीं। पार्टी के कई नेताओं ने उनके बयानों पर नाराजगी जाहिर की थी।
पार्टी के भीतर बढ़ते विवाद और नाराजगी के बीच स्वामी प्रसाद मौर्य ने विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और समाजवादी पार्टी से भी अलग हो गए। इसके बाद उन्होंने अपनी जनता पार्टी का गठन किया। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर इंडिया गठबंधन के साथ आने की उनकी कोशिशों की चर्चा है।
बताया जाता है कि स्वामी प्रसाद मौर्य के व्यवहार और उनके बयानों को लेकर अखिलेश यादव पहले से नाराज थे। ऐसे में गठबंधन में उनकी संभावित एंट्री पर अखिलेश की असहमति को इसी पुरानी तल्खी से जोड़कर देखा जा रहा है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस स्वामी प्रसाद मौर्य को गठबंधन में शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ेगी या अखिलेश यादव के इस स्पष्ट रुख के बाद यह कोशिश ठंडे बस्ते में चली जाएगी? यूपी चुनाव से पहले सपा और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे के साथ-साथ गठबंधन के विस्तार का मुद्दा भी आने वाले दिनों में अहम राजनीतिक विषय बन सकता है।
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