पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर एक बहुत बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है। पार्टी के भीतर असंतोष इस कदर बढ़ चुका है कि टीएमसी अब दोफाड़ होने की कगार पर है।
पहले पश्चिम बंगाल विधानसभा में पार्टी के दो-तिहाई विधायकों ने एक अलग गुट बनाकर विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) को पत्र सौंपा। इसके ठीक बाद, नई दिल्ली में टीएमसी के 20 लोकसभा सांसदों ने भी लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर सदन में एक अलग गुट के रूप में मान्यता देने की मांग कर डाली है।
टीएमसी में मचे इस घमासान के बीच देश में पार्टी टूटने, विलय (Merger) होने और नए गुट को मान्यता मिलने के संवैधानिक नियमों को लेकर बहस छिड़ गई है। आइए विस्तार से समझते हैं कि क्या संविधान की 10वीं अनुसूची (Tenth Schedule) इन बागी सांसदों और विधायकों की सदस्यता बचा पाएगी या नहीं।
1. क्या है एंटी-डिफेक्शन कानून (दलबदल विरोधी कानून)?
भारत में राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने और ‘आया राम, गया राम’ की संस्कृति पर रोक लगाने के लिए साल 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) को जोड़ा गया था।
- सदस्यता कब जाती है: यदि कोई भी चुना हुआ सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी मूल राजनीतिक पार्टी छोड़ता है, या सदन में पार्टी के व्हिप (निर्देश) के खिलाफ जाकर मतदान करता है, तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है।
2. ‘स्प्लिट’ (Split) बनाम ‘मर्जर’ (Merger): अब क्या हैं नियम?
अक्सर लोग सोचते हैं कि पार्टी के कुछ लोग अलग होकर नया गुट बना लें तो उनकी सदस्यता बच जाएगी, लेकिन कानूनी रूप से ऐसा नहीं है।
- 1985 का पुराना नियम (स्प्लिट मान्य था): शुरुआती कानून के तहत, यदि किसी पार्टी के एक-तिहाई (1/3) सदस्य अलग होकर नया दल या गुट बनाते थे, तो उसे ‘वैध विभाजन’ (Split) माना जाता था और उनकी सदस्यता सुरक्षित रहती थी।
- 2003 का नया नियम (स्प्लिट खत्म): साल 2003 में 91वें संविधान संशोधन के जरिए ‘स्प्लिट’ की व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। अब कोई भी गुट यह कहकर नहीं बच सकता कि पार्टी टूट गई है।
- मर्जर (विलय) ही एकमात्र रास्ता: वर्तमान कानून के अनुसार, दलबदल के तहत अयोग्यता से बचने का एकमात्र तरीका ‘मर्जर’ है। इसके लिए किसी भी विधायी दल (Legislative Party) के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्यों का समर्थन अनिवार्य है। यदि दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय करते हैं या मिलकर नया गुट बनाते हैं, तभी उनकी सदस्यता बच सकती है
पार्टी में टूट के कानूनी नियम: एक नजर में
| स्थिति (Scenario) | पुराना नियम (1985) | वर्तमान नियम (2003 से अब तक) | सदस्यता की स्थिति |
| स्प्लिट (Split) | 1/3 संख्या होने पर वैध | अमान्य (पूरी तरह खत्म) | सदस्यता रद्द हो जाएगी |
| मर्जर (Merger) | 1/3 संख्या पर मान्य | 2/3 संख्या अनिवार्य | सदस्यता सुरक्षित रहेगी |
| स्वतंत्र गुट बनाना | संख्या बल के आधार पर राहत | बिना 2/3 के अमान्य | स्पीकर के निर्णय पर निर्भ |
3. विधानसभा और लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) की भूमिका क्यों है अहम?
दलबदल से जुड़े किसी भी मामले में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार सदन के अध्यक्ष (लोकसभा अध्यक्ष या विधानसभा अध्यक्ष) के पास होता है।
अध्यक्ष मुख्य रूप से इन तथ्यों की जांच करते हैं:
- बागी गुट के पास सदन में पार्टी के कुल सदस्यों की दो-तिहाई (2/3) संख्या है या नहीं?
- क्या सदस्यों ने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ी है या वे केवल सदन में अलग बैठने की मांग कर रहे हैं?
- क्या उनके खिलाफ पार्टी विरोधी गतिविधियों के तहत अयोग्यता याचिका दाखिल की गई है?
क्या कोर्ट बदल सकता है स्पीकर का फैसला? पहले स्पीकर के फैसले को अंतिम माना जाता था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों (किहोतो होलोहन केस) के बाद अब स्पीकर का निर्णय भी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आता है। यदि किसी पक्ष को लगता है कि स्पीकर का फैसला राजनीति से प्रेरित है, तो वह हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।
4. हाल के वर्षों में देश में हुई बड़ी राजनीतिक टूट (Case Studies)
भारतीय राजनीति में संख्या बल के दम पर सत्ता और गुट बदलने के कई बड़े उदाहरण सामने आए हैं:
- मध्य प्रदेश (2020): ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस के 22 विधायकों ने इस्तीफा दिया, जिससे कमलनाथ सरकार गिर गई। चूंकि उन्होंने इस्तीफा दिया था, इसलिए बाद में उन्हें उपचुनाव लड़ना पड़ा।
- महाराष्ट्र (2022-2023): पहले एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के दो-तिहाई से अधिक विधायक अलग हुए, जिससे उद्धव सरकार गिरी। इसके बाद अजित पवार के नेतृत्व में एनसीपी (NCP) के दो-तिहाई विधायकों ने अलग राह चुनी। इन दोनों मामलों में ‘दो-तिहाई संख्या बल’ के कारण बागियों की सदस्यता बची रही और चुनाव आयोग ने उन्हें ही असली पार्टी माना।
- आम आदमी पार्टी (AAP): हाल ही में राज्यसभा में राघव चड्ढा के नेतृत्व में दो-तिहाई सदस्यों द्वारा दल छोड़ने की घोषणा के बाद अयोग्यता को लेकर बड़ी बहस छिड़ी थी, हालांकि संख्या बल मजबूत होने के कारण सदस्यों की सदस्यता बरकरार रही।
टीएमसी के बागी सांसदों और विधायकों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वे लोकसभा और विधानसभा में अपनी ‘दो-तिहाई’ की कानूनी संख्या को दस्तावेजों में साबित कर पाते हैं या नहीं। यदि संख्या बल में जरा भी चूक हुई, तो एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत उनकी सदस्यता जानी तय है।