नई दिल्ली: आज 25 सितंबर 2026, शुक्रवार को अनंत चतुर्दशी मनाई जा रही है। यह तिथि भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप को समर्पित मानी जाती है। वहीं शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी को समर्पित माना जाता है। ऐसे में अनंत चतुर्दशी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व बताया जाता है। पूजा के दौरान 14 गांठ वाला अनंत सूत्र बांधने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस धागे से जुड़ी अनंत चतुर्दशी की कथा का पाठ करने से व्रत का महत्व समझ में आता है। यह कथा सुशीला और कौंडिन्य ऋषि से जुड़ी है, जिसे भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाया था।
युधिष्ठिर को श्रीकृष्ण ने बताया अनंत व्रत का महत्व
कथा के अनुसार, पांडव द्यूत-क्रीड़ा में कौरवों से हार गए थे। हार के बाद उन्हें प्रतिज्ञा के अनुसार 12 वर्ष का वनवास भोगना पड़ा। वनवास के दौरान पांडवों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ा। इसी दौरान एक दिन भगवान कृष्ण पांडवों से मिलने पहुंचे।
युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को अपनी परेशानियां बताईं और उनसे संकट दूर करने का उपाय पूछा। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें विधिपूर्वक अनंत भगवान का व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इस व्रत से संकट दूर होने और खोया हुआ राज्य वापस मिलने की मान्यता है। इसके बाद श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को अनंत चतुर्दशी की कथा सुनाई।
सुशीला और कौंडिन्य ऋषि की कहानी
प्राचीन समय में सुमंत नाम के एक तपस्वी ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी का नाम दीक्षा था। दोनों की एक पुत्री थी, जिसका नाम सुशीला था। सुशीला धर्मपरायण और गुणवान थी। जब वह बड़ी हुई तो उसकी माता दीक्षा का निधन हो गया।
इसके बाद सुमंत ने कर्कशा नाम की महिला से दूसरा विवाह किया। कथा के अनुसार, कर्कशा सुशीला को परेशान करती थी। बाद में सुमंत ने अपनी बेटी सुशीला का विवाह कौंडिन्य ऋषि से कर दिया।
विदाई के समय जब दामाद को कुछ देने की बात आई तो कर्कशा ने ईंट और पत्थरों के टुकड़े बांधकर दे दिए। कौंडिन्य ऋषि इससे दुखी हुए और सुशीला को लेकर अपने आश्रम की ओर चल पड़े। रास्ते में रात हो जाने के कारण दोनों एक नदी के किनारे रुक गए।
सुशीला ने किया अनंत व्रत
नदी के किनारे सुशीला ने कुछ महिलाओं को सुंदर वस्त्रों में एक देवता की पूजा करते देखा। पूछने पर महिलाओं ने उसे अनंत व्रत की महत्ता बताई। इसके बाद सुशीला ने वहीं विधि-विधान से अनंत व्रत किया और 14 गांठ वाला डोरा अपनी भुजा पर बांध लिया।
वह वापस कौंडिन्य ऋषि के पास पहुंची। ऋषि ने उसके हाथ में बंधे डोरे के बारे में पूछा तो सुशीला ने उन्हें पूरी बात बता दी।
डोरा अग्नि में डालते ही बदल गई स्थिति
कथा के अनुसार, कौंडिन्य ऋषि ने आवेश में आकर अनंत डोरे को तोड़ दिया और उसे अग्नि में डाल दिया। इसे भगवान अनंत का अपमान माना गया। इसके बाद ऋषि के जीवन में परेशानियां बढ़ने लगीं और उनकी संपत्ति नष्ट हो गई।
जब कौंडिन्य ने अपनी दरिद्रता का कारण सुशीला से पूछा तो उसने अनंत भगवान के डोरे को जलाने की बात बताई। इसके बाद ऋषि को अपनी गलती का पश्चाताप हुआ।
14 साल के व्रत से दूर हुए कौंडिन्य के कष्ट
कौंडिन्य ऋषि अनंत डोरे की प्राप्ति और भगवान अनंत की कृपा पाने के लिए वन की ओर निकल पड़े। वह कई दिनों तक जंगल में भटकते रहे। निराश होकर एक दिन वह भूमि पर गिर पड़े। कथा के अनुसार, तभी भगवान अनंत उनके सामने प्रकट हुए।
भगवान अनंत ने कौंडिन्य से कहा कि उनके तिरस्कार के कारण उन्हें कष्ट भोगना पड़ा। लेकिन पश्चाताप करने से भगवान उनसे प्रसन्न हुए। उन्होंने कौंडिन्य को घर लौटकर विधिपूर्वक अनंत व्रत करने और 14 वर्षों तक इस व्रत का पालन करने को कहा। मान्यता है कि कौंडिन्य ने ऐसा ही किया और उनके सभी कष्ट दूर हो गए। इसके बाद वह धन-धान्य से संपन्न हो गए।
पांडवों ने भी किया था अनंत व्रत
कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण की सलाह पर युधिष्ठिर ने भी अनंत भगवान का व्रत किया। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से पांडव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए और लंबे समय तक राज्य किया।
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