बिहार विधानसभा चुनाव के बीच चुनाव आयोग के एक बड़े ऐलान ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है. आयोग ने 9 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में “स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन” (SIR) का दूसरा चरण शुरू करने का फैसला किया है. इस निर्णय को लेकर विपक्षी दलों ने आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि उसका यह अभियान किसी भी सूरत में रुकेगा नहीं.
चुनाव आयोग के अनुसार, इस अभियान का मुख्य उद्देश्य वोटर लिस्ट को अपडेट करना और 51 करोड़ मतदाताओं की पात्रता (eligibility) की पुष्टि करना है. इसमें तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, पुडुचेरी, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप शामिल हैं.
यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में भी 2026 में चुनाव निर्धारित हैं.
पश्चिम बंगाल में एसआईआर को लेकर बढ़ा खौफ
पश्चिम बंगाल में इस अभियान को लेकर हालात सबसे तनावपूर्ण बताए जा रहे हैं. कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एसआईआर को लेकर लोगों में भय का माहौल है। लोग अपने दस्तावेजों को सही कराने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं.
रिपोर्ट्स यह भी दावा कर रही हैं कि डर की वजह से कई लोगों ने आत्महत्या तक कर ली है. एक टीवी चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक सात लोगों की जान जा चुकी है, जिनकी मौत को लोग एसआईआर से जोड़कर देख रहे हैं.
जानकारी के अनुसार, नॉर्थ 24 परगना, साउथ 24 परगना, कूचबिहार और हावड़ा जैसे जिलों में स्थिति ज्यादा गंभीर बताई जा रही है. पानीहाटी में आत्महत्या के एक मामले में युवक के सुसाइड नोट में लिखा गया“एनआरसी मेरी मौत का जिम्मेदार है.”
सरकार और विपक्ष आमने-सामने
ममता बनर्जी सरकार ने चुनाव आयोग के इस कदम की कड़ी आलोचना की है और टीएमसी नेताओं व समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन भी किया है. उनका आरोप है कि “एसआईआर स्वीकार नहीं है” और आयोग द्वारा 2002-03 की मतदाता सूची को आधार बनाना अनुचित और खतरनाक है.
वहीं, विपक्षी दलों का कहना है कि आयोग का यह कदम मतदाता सूची को पारदर्शी बनाने के लिए जरूरी है. हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एसआईआर को लेकर बंगाल में जो भय का माहौल बन गया है, वह एनआरसी और नागरिकता कानून की पुरानी बहसों को फिर से जिंदा कर रहा है.