राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर ने यह साफ बयान देकर बिहार की राजनीति में नई हलचल मचा दी है कि वे 2025 के विधानसभा चुनाव में खुद उम्मीदवार के तौर पर मैदान में नहीं उतरेंगे. हालांकि उन्होंने कहा कि “यह फैसला उन्होंने किसी डर या हार की आशंका से नहीं, बल्कि एक बड़े संगठनात्मक लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए किया है“ फिर भी राजनीतिके पंडितों का सवाल है- प्रशांत किशोर की यह घोषणा उनकी रणनीति का हिस्सा है या फिर पहले से हार मान लेने की स्वीकारोक्ति? क्योंकि राजनीति के इतिहास में यह बहुत कम देखने को मिलता है कि कोई नेता खुद पार्टी का चेहरा भी हो और चुनाव लड़ने से खुद को दूर भी रखे.
कुछ समय पहले उनकी तुलना आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल से भी की गई थी. हालांकि दोनों की राजनीतिक यात्रा काफी अलग है.केजरीवाल ने राजनीति में प्रवेश एक बड़े जन आंदोलन के जरिए किया था, जहां भ्रष्टाचार के खिलाफ देशभर से मिला समर्थन उनकी ताकत बना। उन्होंने 2014 में वाराणसी से नरेंद्र मोदी तक को सीधी चुनौती दी. प्रशांत किशोर की पहचान रणनीतिकार के रूप में रही है — पर्दे के पीछे से योजनाएं बनाने वाले व्यक्ति की, न कि जनता की भावनाओं का स्वाभाविक नेतृत्व करने वाले चेहरे की.
अब देखना यह दिलचस्प होगा कि रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर बिना खुद चुनाव लड़े जनभावनाओं को कितना साध पाते हैं?
क्या उनकी यह रणनीति बिहार में कोई नया राजनीतिक समीकरण गढ़ पाएगी, या फिर जनता उन्हें सिर्फ “चुनावी मैनेजर” की नजर से ही देखती रहेगी?