बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी तापमान अभी से बढ़ चुका है. सत्ता गठबंधन के भीतर भी रणनीतियों की धुंध साफ़ दिखाई देने लगी है. JDU द्वारा चुनाव सिर्फ एक चरण में कराने की जोरदार मांग ने इस बहस को और गहरा दिया है कि क्या यह केवल चुनावी प्रबंधन का सवाल है, या इसके पीछे कोई राजनीतिक संदेश छिपा है.
मल्टी-फेज़ चुनाव BJP के डीएनए का हिस्सा
यह वाकई एक दिलचस्प तथ्य है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने आंतरिक संगठनात्मक चुनावों को कई चरणों में आयोजित करती रही है. यह प्रक्रिया उनकी संगठनात्मक संरचना की जटिलता और व्यापकता को दर्शाती है, जिसमें स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक विभिन्न चरणों में नेतृत्व का चयन किया जाता है. साल 2022 और 2025 में भी BJP ने राज्य और राष्ट्रीय अध्यक्षों का चुनाव चरणबद्ध तरीके से कराया.
यानी मल्टी-फेज़ चुनाव BJP के डीएनए का हिस्सा रहा है. साल 2022 और 2025 में भी पार्टी ने राज्य और राष्ट्रीय अध्यक्षों का चुनाव चरणबद्ध तरीके से ही कराया. ऐसे में सवाल यह उठना स्वाभाविक है कि उसी गठबंधन के भीतर से JDU क्यों वन-फेज़ पोलिंग की मांग कर रही है?
JDU की ज़िद के निहितार्थ क्या हैं?
एक चरण में मतदान कराने की मांग केवल लॉजिस्टिक या सुरक्षा की चिंता नहीं मानी जा रही है. इसके पीछे कई राजनीतिक संकेत नजर आते हैं। यह JDU की कोशिश हो सकती है कि वह BJP की बहु-चरणीय चुनावी शैली से खुद को अलग पहचान दे. इसके अलावा, नीतीश कुमार को यह महसूस हो सकता है कि एकमुश्त चुनाव जमीनी रणनीति के लिहाज़ से उनकी पार्टी के लिए अधिक अनुकूल रहेगा. इसी के साथ, यह मांग NDA के भीतर किसी अनकहे तनाव या अविश्वास की झलक भी दे सकती है. क्षेत्रीय प्रभाव वाले इलाकों में एकसाथ मतदान कराने से पार्टी को संभावित लाभ मिलने की संभावना भी है. इस प्रकार, JDU की यह मांग केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं, बल्कि राजनीतिक पोज़िशनिंग का भी संकेत देती है.
BJP बनाम JDU: मांगों में छिपा असंतुलन
BJP ने चुनाव “एक या अधिकतम दो चरण” में कराने का सुझाव दिया है, जबकि JDU स्पष्ट रूप से सिर्फ एक चरण पर अड़ी है. यह अंतर केवल तकनीकी नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है. JDU शायद नहीं चाहती कि BJP अपनी पारंपरिक “फेज़-वाइज स्ट्रैटेजी’’ लागू करे, क्योंकि बहु-चरणीय पैटर्न से BJP को संसाधन, प्रचार और संगठनात्मक नियंत्रण में बढ़त मिलती है, और JDU इससे सतर्क है. साथ ही, नीतीश कुमार यह संदेश देना चाहते हैं कि वे NDA में हैं, लेकिन पूरी तरह निर्भर नहीं हैं.
क्या JDU और BJP में मतभेदों की रेखा खिंच रही है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मांग आने वाले समय में NDA के समीकरण बदलने की भूमिका तय कर सकती है. दो बड़े प्रश्न सामने खड़े हैं:
• क्या JDU खुद को राष्ट्रीय राजनीति में एक अलग धुरी के रूप में गढ़ना चाहती है?
• क्या नीतीश कुमार भाजपा पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं?
फिलहाल, चुनाव आयोग ने इस पर कोई निर्णय नहीं दिया है. लेकिन यह तय है कि BJP और JDU की अलग-अलग प्राथमिकताएँ आने वाले बिहार चुनाव को न केवल दिलचस्प, बल्कि राजनीतिक रूप से धारदार भी बनाएंगी.
वन-फेज़ चुनाव की यह मांग सिर्फ चुनावी तकनीक नहीं—यह संदेश, संकेत और शक्ति-संतुलन की नई कहानी का प्रारंभ हो सकती है. NDA के भीतर की राजनीतिक रेखाचित्र अभी धुंधले हैं, लेकिन हलचल साफ़ है.