कोलकाता। बांग्लादेश से निर्वासित और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए दुनिया भर में संघर्ष करने वाली मशहूर लेखिका तसलीमा नसरीन पूरे 20 साल (18 वर्ष, 8 महीने और 10 दिन) के लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर कोलकाता की धरती पर कदम रखने जा रही हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीति और सांस्कृतिक गलियारों के लिए यह इस दशक की सबसे बड़ी खबरों में से एक है।
तसलीमा नसरीन ने खुद सोशल मीडिया पर इस ‘घरवापसी’ की खुशखबरी साझा की है, जिसने राज्य के साहित्यिक और राजनीतिक जगत में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
1. 1 अगस्त को कट्टरपंथ-विरोधी मंच पर गरजेंगी तसलीमा
तसलीमा नसरीन 1 अगस्त 2026 को कोलकाता के ऐतिहासिक रवींद्र सदन में आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में शिरकत करेंगी:
- आयोजक: यह कार्यक्रम ‘सेकुलर मिशन’ और ‘एचआरबीएफएफ’ (HRBFF) द्वारा आयोजित किया जा रहा है।
- थीम: आयोजकों के मुताबिक, यह निमंत्रण तसलीमा नसरीन के कट्टरवाद के खिलाफ लंबे संघर्ष और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए उनके जज्बे को सम्मानित करने के लिए है। इस कार्यक्रम में देश-विदेश के कई नामी कवि और लेखक भी शामिल हो रहे हैं।
2. बंगाल में ‘सत्ता परिवर्तन’ से बना कोलकाता लौटने का संयोग
तसलीमा नसरीन की इस वापसी के पीछे पश्चिम बंगाल में हुआ बड़ा राजनीतिक उलटफेर माना जा रहा है।
- लेफ्ट सरकार में मिला था देश निकाला: साल 2007 में तत्कालीन वामपंथी (Left) सरकार के दौरान तसलीमा नसरीन के खिलाफ कट्टरपंथियों ने हिंसक विरोध प्रदर्शन किया था। तब कानून-व्यवस्था का हवाला देकर उन्हें जबरन शहर छोड़ने पर मजबूर किया गया था।
- बीजेपी सरकार बनते ही बदली तस्वीर: पिछले दो दशकों में तसलीमा ने कोलकाता लौटने के कई प्रयास किए, लेकिन सुरक्षा कारणों से उनके कार्यक्रम रद्द कर दिए जाते थे। अब पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनने के बाद उनकी वापसी का यह ऐतिहासिक संयोग संभव हो पाया है।
3. तसलीमा ने शेयर की भावुक पोस्ट—”सभी प्रतिक्रियावादी ताकतें परास्त हुईं”
तसलीमा नसरीन ने उस्मान मलिक नाम के एक शख्स की फेसबुक पोस्ट को शेयर करते हुए अपनी खुशी जाहिर की। इस पोस्ट में लिखा है:
“एक लंबे इंतजार का अंत हुआ… 18 साल, 8 महीने और 10 दिन बाद। सभी प्रतिक्रियावादी ताकतों को परास्त कर वे (तसलीमा) लौट रही हैं। हम उनके संघर्ष के साथ थे, हैं और हमेशा रहेंगे।”
बता दें कि तसलीमा का कोलकाता से हमेशा एक गहरा भावनात्मक रिश्ता रहा है। वे कई बार कह चुकी हैं कि वे कोलकाता को अपने सबसे करीब का शहर मानती हैं क्योंकि इसी शहर की आबोहवा में उनका लेखन फला-फूला है।
4. 1994 से झेल रही हैं निर्वासन का दंश
तसलीमा नसरीन का विवादों और संघर्षों से पुराना नाता रहा है:
- ‘लज्जा’ उपन्यास पर फतवा: साल 1994 में उनकी विवादित पुस्तक ‘लज्जा’ के प्रकाशन के बाद बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों ने उनके खिलाफ मौत का फतवा जारी कर दिया था।
- बांग्लादेश में बैन: जान बचाने के लिए दो महीने छिपने के बाद वे स्वीडन चली गईं और तब से लगातार निर्वासन (Exile) में जी रही हैं। बांग्लादेश में आज भी उनकी कई किताबों पर प्रतिबंध लगा हुआ है।
5. 1 अगस्त पर टिकीं सुरक्षा एजेंसियों और साहित्यकारों की नजरें
अब पूरी दुनिया की नजरें 1 अगस्त 2026 पर टिकी हैं। राजनीतिक विश्लेषक और सांस्कृतिक जगत इस बात पर नजर रखेंगे कि नई राजनीतिक व्यवस्था के बीच यह कार्यक्रम कितना शांतिपूर्ण रहता है। साथ ही, यह देखना भी दिलचस्प होगा कि वामपंथ के दौर में जिस शहर ने तसलीमा को बाहर का रास्ता दिखाया था, वह लंबे अंतराल के बाद उनका स्वागत किस अंदाज में करता है।