नई दिल्ली: दांतों में कैविटी होना एक सामान्य समस्या है, लेकिन इसे नजरअंदाज करना आगे चलकर गंभीर परेशानी का कारण बन सकता है। कई लोगों को लगता है कि दांत में कैविटी होने का मतलब रूट कैनाल कराना ही होगा, जबकि ऐसा हर मामले में जरूरी नहीं होता। दांत का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि सड़न कितनी गहराई तक पहुंच चुकी है और क्या संक्रमण दांत की नस तक पहुंचा है।
कब सिर्फ फिलिंग से हो जाता है इलाज?
अगर कैविटी शुरुआती अवस्था में है और केवल दांत की बाहरी परत तक सीमित है, तो आमतौर पर फिलिंग करके दांत को सुरक्षित रखा जा सकता है। इस प्रक्रिया में सड़े हुए हिस्से को साफ कर उसकी जगह विशेष फिलिंग सामग्री भरी जाती है। इससे दांत सामान्य रूप से काम करता रहता है और रूट कैनाल की जरूरत नहीं पड़ती। इसलिए समय रहते दंत चिकित्सक से जांच कराना बेहद जरूरी माना जाता है।
किन मामलों में पड़ती है रूट कैनाल की जरूरत?
जब कैविटी गहरी होकर दांत की नस यानी पल्प तक पहुंच जाती है, तब केवल फिलिंग पर्याप्त नहीं होती। ऐसे मामलों में रूट कैनाल ट्रीटमेंट की जरूरत पड़ सकती है। इसके सामान्य लक्षणों में लगातार तेज दर्द, ठंडी या गर्म चीज खाने पर लंबे समय तक दर्द रहना, दांत पर दबाव डालने पर तकलीफ होना, मसूड़ों में सूजन आना या पस बनना शामिल हैं। इस स्थिति में संक्रमित हिस्से को निकालकर दांत को बचाने की कोशिश की जाती है।
क्या रूट कैनाल कराना दर्दनाक होता है?
रूट कैनाल को लेकर लोगों के मन में अक्सर डर रहता है, लेकिन आधुनिक तकनीक और लोकल एनेस्थीसिया की मदद से यह प्रक्रिया पहले की तुलना में काफी आरामदायक हो गई है। कई मरीजों को इलाज के दौरान केवल सामान्य फिलिंग जितनी ही असुविधा महसूस होती है। हालांकि इलाज में देरी करने पर संक्रमण बढ़ सकता है, जिससे परेशानी भी ज्यादा हो सकती है।
बिना जांच खुद फैसला न लें
हर कैविटी का इलाज एक जैसा नहीं होता। इसलिए केवल इंटरनेट या किसी अन्य व्यक्ति की सलाह के आधार पर यह मान लेना सही नहीं है कि रूट कैनाल ही कराना पड़ेगा। सही इलाज का फैसला दंत चिकित्सक जांच के बाद ही करते हैं।