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Reading: प्राचीन मिस्र से वर्ल्ड वॉर तक… आखिर महिलाओं में शेविंग का चलन कैसे बना? जानिए दिलचस्प इतिहास
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फीचर

प्राचीन मिस्र से वर्ल्ड वॉर तक… आखिर महिलाओं में शेविंग का चलन कैसे बना? जानिए दिलचस्प इतिहास

vineet verma
Last updated: July 11, 2026 11:44 am
vineet verma
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नई दिल्ली: आज के दौर में वैक्सिंग और शेविंग महिलाओं की नियमित ग्रूमिंग का अहम हिस्सा मानी जाती है। हाथ, पैर, अंडरआर्म्स और चेहरे के अनचाहे बाल हटाना आम बात हो गई है। हालांकि, यह चलन हमेशा से नहीं था। इतिहास बताता है कि महिलाओं में शरीर के बाल हटाने की परंपरा सदियों पुरानी जरूर है, लेकिन इसे व्यापक स्तर पर अपनाने के पीछे 20वीं सदी के फैशन और बड़े मार्केटिंग अभियानों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

Contents
प्राचीन सभ्यताओं में था बाल हटाने का चलनमध्यकाल में बदली सोच, कम हो गया चलन20वीं सदी में फैशन और विज्ञापनों ने बदली तस्वीर1915 का अभियान बना बड़ा मोड़विश्व युद्ध ने बदली पैरों की शेविंग की आदतफैशन और मार्केटिंग ने बदल दी ग्रूमिंग की परिभाषा

प्राचीन सभ्यताओं में था बाल हटाने का चलन

महिलाओं के शरीर के बाल हटाने का इतिहास प्राचीन मिस्र और रोमन साम्राज्य तक पहुंचता है। उस समय उच्च वर्ग की महिलाएं शरीर के बाल हटाना सामाजिक प्रतिष्ठा और सौंदर्य का प्रतीक मानती थीं। इसके लिए सीपियों से बने चिमटे, मधुमक्खी के मोम और चीनी के लेप जैसी पारंपरिक विधियों का इस्तेमाल किया जाता था।

वहीं, प्राचीन ग्रीस और रोमन साम्राज्य की महिलाएं पत्थरों और विशेष प्रकार की क्रीम की मदद से शरीर के बाल हटाती थीं। हालांकि, यह प्रथा मुख्य रूप से संपन्न और उच्च वर्ग तक ही सीमित थी।

मध्यकाल में बदली सोच, कम हो गया चलन

समय के साथ सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं में बदलाव आया। मध्यकालीन यूरोप में शरीर के बाल हटाने की परंपरा काफी हद तक समाप्त हो गई। उस दौर में महिलाएं आम तौर पर शरीर के बाल नहीं हटाती थीं, लेकिन चेहरे की बनावट को आकर्षक दिखाने के लिए आईब्रो और हेयरलाइन को पीछे तक साफ करने का चलन जरूर मौजूद था।

20वीं सदी में फैशन और विज्ञापनों ने बदली तस्वीर

19वीं सदी के आखिर तक पश्चिमी देशों की अधिकांश महिलाएं शरीर के बाल नहीं हटाती थीं। इसकी बड़ी वजह उस समय के ऐसे परिधान थे, जो शरीर को पूरी तरह ढककर रखते थे। ऐसे में बाल हटाने की आवश्यकता महसूस नहीं होती थी।

लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत में फैशन तेजी से बदला। बिना बाजू वाले परिधानों का चलन बढ़ा और इसी बदलाव को रेजर बनाने वाली कंपनियों ने व्यावसायिक अवसर के रूप में देखा। महिलाओं की सुंदरता और आधुनिकता को नए तरीके से पेश करते हुए विज्ञापन अभियान शुरू किए गए।

1915 का अभियान बना बड़ा मोड़

साल 1915 महिलाओं की शेविंग के इतिहास में अहम माना जाता है। इसी दौरान अमेरिका और यूरोप में एक बड़े मार्केटिंग अभियान के जरिए महिलाओं को अंडरआर्म्स के बाल हटाने के लिए प्रेरित किया गया। इस अभियान में साफ-सुथरे अंडरआर्म्स को आधुनिक और फैशनेबल जीवनशैली से जोड़ा गया।

इसके साथ ही महिलाओं के लिए विशेष रेजर भी बाजार में उतारे गए। अभियान को व्यापक सफलता मिली और धीरे-धीरे अंडरआर्म्स शेविंग महिलाओं की नियमित ग्रूमिंग का हिस्सा बन गई।

विश्व युद्ध ने बदली पैरों की शेविंग की आदत

अंडरआर्म्स शेविंग आम होने के बावजूद महिलाएं लंबे समय तक पैरों के बाल नहीं हटाती थीं, क्योंकि वे नायलॉन स्टॉकिंग्स पहनती थीं, जिससे पैर ढके रहते थे।

हालांकि, विश्व युद्ध के दौरान स्थिति बदल गई। युद्ध के समय पैराशूट बनाने में बड़े पैमाने पर नायलॉन का इस्तेमाल होने लगा, जिससे बाजार में नायलॉन स्टॉकिंग्स की कमी हो गई। इसके बाद महिलाओं ने बिना स्टॉकिंग्स के स्कर्ट पहनना शुरू किया और पैरों के बाल हटाने का चलन तेजी से बढ़ गया।

बाद के वर्षों में घुटनों से ऊपर की ड्रेसेज और बिकिनी जैसे परिधानों की लोकप्रियता बढ़ने के साथ पैरों की शेविंग भी महिलाओं की सामान्य ग्रूमिंग आदत का हिस्सा बन गई।

फैशन और मार्केटिंग ने बदल दी ग्रूमिंग की परिभाषा

इतिहास पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि महिलाओं में शरीर के बाल हटाने की परंपरा प्राचीन सभ्यताओं से जुड़ी रही है, लेकिन इसे व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता 20वीं सदी में मिली। फैशन में बदलाव और प्रभावशाली मार्केटिंग अभियानों ने शेविंग को धीरे-धीरे आधुनिक ग्रूमिंग और व्यक्तिगत पसंद के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।

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