दुबई/दोहा। होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) के पास सऊदी अरब और कतर के जहाजों पर हुए हालिया हमलों ने मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति (Geopolitics) को पूरी तरह से पलट दिया है। खाड़ी देशों में सबसे बड़ा उलटफेर कतर के रुख में देखने को मिला है। अब तक ईरान के सबसे करीबी सहयोगियों में गिने जाने वाले कतर ने इन हमलों के लिए सीधे तौर पर तेहरान (ईरान) को जिम्मेदार ठहराया है।
कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजिद अल-अंसारी ने कड़े शब्दों में ईरान से मांग की है कि वह क्षेत्र की सुरक्षा को खतरे में डालने वाली अपनी सभी गतिविधियां तुरंत बंद करे। अल-अंसारी ने चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान अपने सीमित हितों के लिए दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति (Energy Supply) और खाड़ी देशों के संसाधनों को दांव पर न लगाए। दूसरी ओर, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कतर के इन आरोपों को ‘अच्छे पड़ोसी के रिश्तों के खिलाफ’ बताया है।
- बदला समीकरण: जहाजों पर हमले के बाद कतर ने ईरान के खिलाफ खोला मोर्चा।
- बहिष्कार के दिन भूले: 2017 के संकट में मदद करने वाले ईरान पर कतर ने पहली बार लगाया सीधा आरोप।
- वैश्विक संकट का डर: होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया का 20% कच्चा तेल गुजरता है, सप्लाई रुकने से बढ़ सकती हैं कीमतें।
- GCC की एकजुटता: सऊदी अरब और कतर के करीब आने से गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) होगी और मजबूत।
कतर का रुख बदलना क्यों है ‘ऐतिहासिक’?
कतर की मुख्य रणनीति हमेशा से अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन बनाए रखने की रही है। कतर में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य बेस होने के बावजूद, उसने दोनों देशों में तनाव कम करने के लिए ‘दोहा वार्ता’ की मेजबानी की थी। सऊदी, यूएई और बहरीन के विपरीत कतर के ईरान से रिश्ते हमेशा मधुर रहे, जिसके पीछे दो मुख्य कारण थे:
- साझा गैस फील्ड: कतर और ईरान दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस भंडार ‘साउथ पार्स/नॉर्थ डोम गैस फील्ड’ को साझा करते हैं।
- 2017 का संकट: जब सऊदी अरब, यूएई, बहरीन और मिस्र ने कतर का कूटनीतिक बहिष्कार किया था, तब ईरान ने ही कतर के लिए अपने हवाई और समुद्री रास्ते खोले थे।
ऐसे में कतर द्वारा पुरानी दोस्ती और आर्थिक हितों को किनारे रखकर ईरान पर सीधा हमला बोलना यह साफ करता है कि अब बात उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा पर आ गई है।
अब मिडिल ईस्ट में क्या बदलेगा?
1. सऊदी अरब और कतर की नई दोस्ती
साल 2021 के अल-उला समझौते (Al-Ula Accord) के बाद सऊदी और कतर के रिश्ते सुधरे जरूर थे, लेकिन पूरी तरह भरोसा कायम नहीं हुआ था। जहाजों पर हुए इस हमले ने दोनों देशों को एक साझा दुश्मन (ईरान) के खिलाफ खड़ा कर दिया है, जिससे उनके बीच रक्षा और सुरक्षा सहयोग तेजी से बढ़ेगा।
2. ईरान का पूर्ण कूटनीतिक अलगाव
ईरान पहले से ही पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों और आंतरिक आर्थिक संकट से जूझ रहा है। अब तक उसे खाड़ी क्षेत्र में कतर और ओमान जैसे देशों के ‘नरम रुख’ का फायदा मिलता था। लेकिन कतर के पाला बदलने से GCC (बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और यूएई) ईरान के खिलाफ पूरी तरह एकजुट हो सकती है, जिससे ईरान पर क्षेत्रीय दबाव चरम पर पहुंच जाएगा।
वैश्विक बाजार और भारत पर क्या होगा असर?
होर्मुज स्ट्रेट को दुनिया की सबसे संवेदनशील लाइफलाइन माना जाता है।
- दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल (Crude Oil) और कतर की अधिकांश LNG (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरती है।
- यदि इस क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है या यह स्थिति युद्ध में तब्दील होती है, तो वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की सप्लाई ठप हो सकती है।
- इसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिसका सीधा असर भारत सहित दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा।
अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि कतर के इस अप्रत्याशित कदम पर ईरान क्या जवाबी रुख अपनाता है और खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा के नए समीकरण क्या मोड़ लेते हैं।