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Trending Newsफीचर

Birthday Special: जब पहली बार लखनऊ में सुनाई दी थी ‘माही’ के मारने की गूंज… तब किसने सोचा था विश्व क्रिकेट पर राज करेगा “थाला”!

Chaturvedi Shruti V.
Last updated: July 7, 2026 1:33 pm
Chaturvedi Shruti V.
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अप्रैल 1998 में लखनऊ की सरजमीं पर खेली गई ‘ऑल इंडिया शीश महल ट्रॉफी’ एक ऐसे सुनहरे इतिहास की गवाह बनी, जिससे उस वक्त विश्व क्रिकेट भी अनजान था। K. D. Singh Babu Stadium, काल्विन तालुकेदार्स ग्राउंड और चौक स्टेडियम के उमस भरे माहौल में जब ONGC की एक बेहद साधारण और कमजोर मानी जाने वाली टीम मैदान पर उतरी, तो उसमें रांची का एक 17 साल का लंबे बालों वाला लड़का भी शामिल था, जिसे कोई नहीं जानता था।

Contents
‘माही’ के फर्श से अर्श तक का सफरटिकट कलेक्टर से ट्रॉफियों के कलेक्टर तक का संघर्षअंतरराष्ट्रीय मंच पर धमाकेदार दस्तक‘कैप्टन कूल’ का सुनहरा दौर और वर्ल्ड कप रिकॉर्ड्स’क्यों चुना था नंबर 7 की जर्सी का नंबर?फिनिशर का अंदाज़ और अनबिलीवेबल आंकड़ेऑल-इन-वन रिकॉर्ड टेबलफेयरवेल और अनफॉरगेटेबल लेगेसी

मैच के दौरान जब ONGC की पूरी टीम अनुभवी गेंदबाजों के सामने ताश के पत्तों की तरह ढह गई और प्रतियोगिता से जल्द ही बाहर होने की कगार पर पहुंच गई, तब संकट के उस दौर में इस नए-नवेले विकेटकीपर-बल्लेबाज ने क्रीज पर कदम रखा और मैदान के चारों तरफ ऐसे कड़क, बेखौफ व अपरंपरागत शॉट्स खेले कि पूरा स्टेडियम सन्न रह गया।

लखनऊ के एक वरिष्ट क्रिकेट पत्रकार  के अनुसार, भले ही अपनी टीम के कमजोर प्रदर्शन के कारण उनका सफर वहीं थम गया, लेकिन लखनऊ की इस जमीन ने उस युवा के भीतर छिपे महान ‘फिनिशर’ की पहली ऐतिहासिक झलक देख ली थी, जिसने इसके ठीक 6 साल बाद 2004 में भारतीय टीम में शामिल होकर महेंद्र सिंह धोनी के रूप में क्रिकेट की तकदीर बदल दी, हालांकि एक अनोखा संयोग यह भी रहा कि इतने लंबे अंतरराष्ट्रीय करियर के बावजूद धोनी को लखनऊ की धरती पर कोई इंटरनेशनल मैच खेलने का मौका नहीं मिल सका, हालाँकि वो IPL मैच में कई बार खेलते नज़र आए है और MS  धोनी आज अपना 45वां जन्मदिन मना रहे हैं।

‘माही’ के फर्श से अर्श तक का सफर

7 जुलाई 1981 को बिहार के रांची में एक मिडिल क्लास राजपूत परिवार में महेंद्र सिंह धोनी का जन्म हुआ। पिता ‘पान सिंह’ मेकोन “MECON” कंपनी में जूनियर मैनेजमेंट वर्ग में काम करते थे और मां ‘देवकी देवी’ एक साधारण गृहिणी थीं। रांची में पान सिंह और उनके परिवार को रहने के लिए एक सरकारी घर स्थान मिला था। बचपन में माही का झुकाव क्रिकेट की तरफ बिल्कुल नहीं था,वो  डीएवी जवाहर विद्या मंदिर, श्यामली रांची में पढ़ते थे और स्कूल में फुटबॉल के शानदार गोलकीपर और बैडमिंटन के बेहतरीन खिलाड़ी थे।

लेकिन उनके स्कूल के कोच ने उनकी गोलकीपिंग रिफ्लेक्स और फुर्ती को देखकर उन्हें विकेटकीपिंग करने की सलाह दी। यहीं से धोनी के हाथ में क्रिकेट की गेंद और बल्ला आया, और भारतीय खेल इतिहास का सबसे बड़ा अध्याय शुरू हुआ।

टिकट कलेक्टर से ट्रॉफियों के कलेक्टर तक का संघर्ष

धोनी का शुरुआती घरेलू क्रिकेट का सफर 1999 से 2004 के बीच बिहार और बाद में झारखंड की टीम से शुरू हुआ। परिवार की आर्थिक स्थिति को संभालने और क्रिकेट के सपनों को जिंदा रखने के लिए उन्होंने भारतीय रेलवे में खड़गपुर स्टेशन पर ‘ट्रेन टिकट परीक्षक’ (TTE) की सरकारी नौकरी ज्वाइन की। दिन भर प्लेटफॉर्म पर यात्रियों के टिकट काटना और रात को रेलवे ट्रैक के पास बिजली के खंभों की रोशनी में क्रिकेट की प्रैक्टिस करना, धोनी का यह संघर्ष सालों चला। लेकिन माही के सपने खड़गपुर के छोटे से प्लेटफॉर्म से कहीं बड़े थे। उन्होंने आखिरकार एक बड़ा जोखिम लिया, रेलवे की सरकारी नौकरी छोड़ी और अपनी किस्मत को पूरी तरह क्रिकेट के मैदान के हवाले कर दिया।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर धमाकेदार दस्तक

दिसंबर 2004 में बांग्लादेश के खिलाफ धोनी ने अपना वनडे डेब्यू किया। शुरुआत बेहद निराशाजनक रही और वे अपनी पहली ही गेंद पर बिना खाता खोले रन आउट हो गए। लेकिन असली धमाका हुआ साल 2005 में पाकिस्तान के खिलाफ विशाखापट्टनम में, जब कप्तान सौरव गांगुली ने उन पर भरोसा जताते हुए उन्हें नंबर 3 पर बल्लेबाजी के लिए भेजा।

धोनी ने वहां 148 रनों की तूफानी पारी खेलकर पाकिस्तानी गेंदबाजी आक्रमण की धज्जियां उड़ा दीं। इसके कुछ ही समय बाद श्रीलंका के खिलाफ जयपुर में नाबाद 183 रन बनाकर उन्होंने दुनिया को यह कड़ा संदेश दे दिया कि क्रिकेट में अब एक नए युग की शुरुआत हो चुकी है।

‘कैप्टन कूल’ का सुनहरा दौर और वर्ल्ड कप रिकॉर्ड्स’

साल 2007 में जब भारतीय क्रिकेट सचिन, राहुल द्रविड़ और गांगुली जैसे दिग्गजों के बिना पहले टी-20 वर्ल्ड कप में उतरा, तो कप्तानी की कमान धोनी को सौंपी गई। धोनी ने युवा टीम के साथ मिलकर इतिहास रचा और पाकिस्तान को हराकर भारत को पहला टी-20 विश्व कप जिताया था।

इसके बाद आया साल 2011, जब मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में धोनी के उस ऐतिहासिक और अजेय छक्के ने भारत को 28 साल बाद वन डे क्रिकेट वर्ल्ड कप का चैंपियन बनाया,

2013 में उन्होंने आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी भी जीती, जिसके साथ वे दुनिया के एकमात्र ऐसे कप्तान बन गए जिन्होंने आईसीसी की सभी तीनों मुख्य ट्रॉफियां अपने नाम की हैं

उनकी कप्तानी में ही भारतीय टीम पहली बार आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में दुनिया की नंबर 1 टीम बनी थी।

क्यों चुना था नंबर 7 की जर्सी का नंबर?

MS Dhoni  की नंबर 7 की जर्सी क्रिकेट वर्ल्ड में एक ऐतिहासिक प्रतीक बन चुकी है। साल 2023 में BCCI ने धोनी के सम्मान में इस नंबर को रिटायर भी कर दिया था, जिसका मतलब है कि अब कोई दूसरा भारतीय खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में इस नंबर की जर्सी नहीं पहन सकता। सचिन तेंदुलकर की नंबर 10 जर्सी के बाद रिटायर होने वाली यह दूसरी जर्सी है।

एक इवेंट के दौरान जब धोनी से पूछा गया कि उन्होंने नंबर 7 ही क्यों चुना, तो उन्होंने बेहद मजाकिया और गणितीय अंदाज में इसका कारण बताया।

एमएस धोनी का जन्म 7 जुलाई को हुआ था। जुलाई साल का सातवां महीना होता है। इस तरह उनकी जन्म तिथि और महीने दोनों में ही नंबर 7 आता है। धोनी का जन्म वर्ष 1981 (81) है। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि यदि 8 में से 1 को घटाया जाए (8 – 1 = 7), तो भी परिणाम 7 ही आता है।

धोनी ने हंसते हुए कहा, “यह वह समय या दिन था जब मेरे माता-पिता ने तय किया कि मैं इस धरती पर आऊंगा। इसलिए जब मुझसे पूछा गया कि आपको कौन सा नंबर चाहिए, तो मेरे लिए यह फैसला करना बेहद आसान था।”

धोनी ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से 15 अगस्त 2020 को संन्यास ले लिया था, लेकिन वे चेन्नई सुपर किंग्स “CSK” के लिए IPL में 7 नंबर की जर्सी के साथ लगातार खेलते आ रहे हैं।

फिनिशर का अंदाज़ और अनबिलीवेबल आंकड़े

धोनी ने सीमित ओवरों के क्रिकेट में ‘फिनिशर’ की डेफिनिशन को पूरी तरह से रीडिफाइन किया। वे मैच को आखिरी ओवर, आखिरी गेंद तक ले जाते और बेहद शांत दिमाग से रन-रेट की गणना करके टीम को जीत की दहलीज पार कराते थे।

ऑल-इन-वन रिकॉर्ड टेबल

क्रिकेट फॉर्मेटमैचकुल रनबल्लेबाजी औसतसर्वोच्च स्कोरकैच (विकेट के पीछे)स्टंपिंग
(ODI)35010,77350.57183*321123 (विश्व रिकॉर्ड)
टेस्ट 904,87638.0922425638
टी-20 981,61737.60565734
कुल 53817,26644.96

धोनी ने 341 वनडे मैचों में 50.72 की शानदार औसत से 10,500 से अधिक रन बनाए और ये रन उन्होंने किसी टॉप ऑर्डर में नहीं, बल्कि नंबर 5 और 6 जैसे कठिन लोअर-मिडल ऑर्डर में बल्लेबाजी करते हुए बनाए थे। टेस्ट क्रिकेट में भी उन्होंने 90 मैचों में 4,876 रन बनाए, जिसमें ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चेन्नई में खेली गई 224 रनों की कप्तानी पारी आज भी याद की जाती है। विकेट के पीछे उनके नाम वनडे में 314 कैच और 120 स्टंपिंग दर्ज हैं। उनकी बिजली जैसी तेज स्टंपिंग के आगे बड़े से बड़ा बल्लेबाज भी क्रीज छोड़ने से डरता था।

फेयरवेल और अनफॉरगेटेबल लेगेसी

साल 2014 में मेलबर्न टेस्ट के बाद धोनी ने अचानक टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहकर पूरे क्रिकेट जगत को स्तब्ध कर दिया था। इसके बाद 15 अगस्त 2020 की शाम को एक साधारण से वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से पूरी तरह संन्यास की घोषणा कर दी। हालांकि, वे इंडियन प्रीमियर लीग “IPL” में चेन्नई सुपर किंग्स “CSK” के लिए ‘थाला’ के रूप में आज भी करोड़ों फैंस के दिलों पर राज कर रहे हैं।

खेल में उनके इस अभूतपूर्व योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मेजर ध्यानचंद खेल रत्न, पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा है, और भारतीय सेना ने उन्हें मानद लेफ्टिनेंट कर्नल की उपाधि दी है।

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