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Reading: “El Nino” नहीं, ‘हीट डोम’ का कहर! यूरोप में 43°C का टॉर्चर, 257 मौतें  और 14 देशों में मचा है हाहाकार
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“El Nino” नहीं, ‘हीट डोम’ का कहर! यूरोप में 43°C का टॉर्चर, 257 मौतें  और 14 देशों में मचा है हाहाकार

news desk
Last updated: June 26, 2026 3:20 pm
news desk
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जब हम और आप मानसून का इंतज़ार कर रहे हैं, ठीक उसी वक्त दुनिया का एक बड़ा हिस्सा ‘आग के गोले’ में तब्दील हो चुका है। यूरोप इस समय इतिहास की सबसे भीषण और जानलेवा “हीटवेव” का सामना कर रहा है। हालात इतने बदतर हैं कि फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन और इटली समेत 14 देश भीषण तपिश से झुलस रहे हैं। अब तक 257 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।

Contents
टूट गए सारे रिकॉर्डक्या है ‘वेट बल्ब टेम्परेचर’ का खतरा?अल नीनो नहीं, इंसानी हरकतें हैं जिम्मेदारपटरियां पिघलीं, जनजीवन ठपएक्सपर्ट्स की चेतावनी

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वैज्ञानिक इस महा-संकट के लिए प्रशांत महासागर के ‘अल नीनो’ El Niño को नहीं, बल्कि सीधे तौर पर इंसानी लापरवाही और ‘क्लाइमेट चेंज’ को जिम्मेदार मान रहे हैं।

टूट गए सारे रिकॉर्ड

यूरोप में गर्मी ने इस बार सारे पुराने रिकॉर्ड्स को ध्वस्त कर दिया है। फ्रांस के पल्लुआउ “Palluau” शहर में दिन का तापमान 43.8°C तक जा पहुंचा। हैरान करने वाली बात यह है कि यहाँ रातें भी सुलग रही हैं; औसत न्यूनतम तापमान 38.5°C दर्ज किया गया है, जिसने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। भयंकर गर्मी से राहत पाने के लिए नदियों और तालाबों में उतरे करीब 40 लोगों की डूबने से मौत हो गई।

वहीं, ब्रिटेन के समरसेट में पारा 36.7°C पहुंच गया, जिसने पिछले 70 सालों के जून महीने के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। सबसे ज्यादा तबाही स्पेन में देखने को मिली है, जहाँ अकेले 212 लोगों की मौत हीटस्ट्रोक के कारण हुई है।

क्या है ‘वेट बल्ब टेम्परेचर’ का खतरा?

इस बार की गर्मी सिर्फ तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जानलेवा साबित हो रही है ‘वेट बल्ब ग्लोब टेम्परेचर’ के कारण। यूरोप के करीब 45% शहरों ने इस खतरनाक पैमाने के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है।

वेट बल्ब टेम्परेचर वह पैमाना है जो यह तय करता है कि गर्मी और उमस के बीच हमारा शरीर पसीना बहाकर खुद को कितना ठंडा रख सकता है। जब हवा में नमी बहुत ज्यादा होती है और तापमान भी हाई होता है, तो शरीर का पसीना सूखना बंद हो जाता है। ऐसे में इंसानी शरीर का ‘नेचुरल कूलिंग सिस्टम’ फेल हो जाता है, जिससे सीधे ऑर्गन फेलियर (अंगों का काम बंद करना) और मौत का खतरा बढ़ जाता है।

अल नीनो नहीं, इंसानी हरकतें हैं जिम्मेदार

इंपीरियल कॉलेज लंदन और वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन के वैज्ञानिकों की ताजा रिसर्च ने एक डराने वाला खुलासा किया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर यही मौसमी सिस्टम आज से 50 साल पहले आया होता, तो तापमान आज के मुकाबले 3.5°C कम होता।

साफ है कि कोयला, तेल और गैस के अंधाधुंध इस्तेमाल ने धरती के वायुमंडल को एक ‘हीट डोम’ “(Heat Dome” में बदल दिया है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण ऐसी दमघोंटू रातों का खतरा साल 2003 की उस ऐतिहासिक हीटवेव से 100 गुना ज्यादा बढ़ गया है, जिसने यूरोप में 70 हजार लोगों की जान ली थी।

पटरियां पिघलीं, जनजीवन ठप

इस ऐतिहासिक हीटवेव ने यूरोप के इंफ्रास्ट्रक्चर को घुटनों पर ला दिया है, अत्यधिक गर्मी के कारण रेलवे ट्रैक के पिघलने और फैलने का खतरा पैदा हो गया है, जिसके चलते कई रूटों पर ट्रेनें रोक दी गई हैं। एयर कंडीशनर और कूलिंग सिस्टम के अत्यधिक इस्तेमाल से बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर है, जिससे कई शहरों में ‘ब्लैकआउट’ की स्थिति है। फ्रांस और स्पेन के जंगलों में सूखे के कारण ‘वाइल्डफायर’ (Wildfires) का रेड अलर्ट जारी किया गया है।

एक्सपर्ट्स की चेतावनी

जलवायु वैज्ञानिक फ्रीडरिक ओटो के मुताबिक, यूरोप इस समय दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है। फिलहाल ग्लोबल वार्मिंग का स्तर प्री-इंडस्ट्रियल काल से 1.4°C ऊपर है, और स्थिति काबू से बाहर हो रही है। अगर दुनिया ने कार्बन उत्सर्जन को तुरंत कंट्रोल नहीं किया, तो आने वाले सालों में यह गर्मी इंसानी वजूद के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाएगी।

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