79वें कान्स फिल्म फेस्टिवल “Cannes Film Festival 2026” से दक्षिण एशियाई सिनेमा के लिए एक ऐसी ऐतिहासिक खबर आई है, जिसने हर किसी को गर्व से सातवें आसमान पर पहुचा दिया है। नेपाल की फिल्म ‘एलीफेंट्स इन द फॉग’ (Elephants in the Fog) ने कान्स के बेहद प्रेस्टीजियस ‘अन सर्टेन रिगार्ड’ सेक्शन में ‘जूरी प्राइज’ जीतकर इतिहास रच दिया है। नेपाल के सिनेमाई इतिहास में यह अब तक की सबसे बड़ी और पहली वैश्विक जीत है। इसके साथ ही फिल्म ने ‘बेस्ट साउंड क्रिएशन अवॉर्ड’ भी अपने नाम किया है।
लेकिन इस जश्न के बीच, भारत के फिल्म गवर्नमेंट सिस्टम पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान भी लग गया है।
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म के राइटर और डायरेक्टर अविनाश विक्रम शाह हैं (जिन्होंने 2022 में शॉर्ट फिल्म ‘लोरी’ के लिए कान्स में स्पेशल मेंशन जीता था)। यह उनकी पहली फीचर फिल्म है। फिल्म की कहानी नेपाल के तराई इलाके के एक गांव में रहने वाले “किन्नर समुदाय” के इर्द-गिर्द घूमती है।

मुख्य किरदार ‘पिराती'(प्लेड बाय पुष्पा लामा) अपने समुदाय की मुखिया है, जो एक आम इंसान की तरह प्यार और घर बसाने का सपना देखती है। लेकिन तभी उसके समुदाय की एक लड़की गायब हो जाती है। इसके बाद कहानी प्यार और जिम्मेदारी के बीच के गहरे संघर्ष को दिखाती है। फिल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसमें किन्नर समुदाय के लोगों ने ही एक्टिंग कि है।

काठमांडू एयरपोर्ट पर मंत्रियों ने किया ‘राजकीय स्वागत’
कान्स के मंच पर इतिहास रचने के बाद जब सोमवार सुबह फिल्म की टीम काठमांडू के त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय विमानस्थल पहुंची, तो वहां का नजारा देखने लायक था। नेपाल सरकार के दो बड़े मंत्रियो ने सुबह-सुबह खुद टीम को लेने एयरपोर्ट पहुंचेऔर उनका स्वागत किया।

पारंपरिक ‘नौमती बाजा’ की धुनों के बीच मेकर्स को खादा और फूलों की माला पहनाई गई। मंच पर टीम को नेपाल का राष्ट्रध्वज ओढ़ाया गया। इस मौके पर नेपाल के चलचित्र विकास बोर्ड ने पूरी टीम को सम्मानित करने और 2,50000 नेपाली रुपये का नकद पुरस्कार देने की भी घोषणा की।
अविनाश विक्रम शाह ने भावुक होते हुए कहा:
“सिनेमा में अंधेरे के पार देखने की ताकत होती है। हमारे समाज के जिस हिस्से को लंबे समय से अदृश्य रखा गया था, इस अवॉर्ड ने उसे दुनिया के सामने लाकर दृश्यमान (visible) बना दिया है।”
भारतीय क्रू का कमाल, लेकिन ‘भारतीय सिस्टम’ हुआ फेल!
इस फिल्म की जीत जितनी नेपाल के लिए गर्व की बात है, भारत के लिए उतनी ही सेल्फ- रिफ्लेक्शन करने वाली है। इस फिल्म को इस मुकाम तक पहुंचाने में भारतीय टैलेंट का बहुत बड़ा हाथ है:
फिल्म की सिनमैटोग्राफर (DOP) कोलकाता की “मोदहुरा पल्लीत” हैं।
फिल्म के साउंड डिजाइनर “अशोक मंडल” हैं (जिन्हें कान्स में बेस्ट साउंड का अवॉर्ड भी मिला)।
फिल्म के कलर डिस्ट “अविषेक घोष” हैं।

कहाँ चूका भारत?
नेपाली मेकर्स इस कमाल की कहानी को लेकर सबसे पहले भारत सरकार के ‘एनएफडीसी फिल्म बाजार’ (NFDC Film Bazaar) गए थे, ताकि भारत से इसे को-प्रोडक्शन और फंडिंग मिल सके। लेकिन भारतीय सिस्टम ने इस प्रोजेक्ट को रिजेक्ट कर दिया और इसकी अहमियत नहीं समझी।
जब भारत ने हाथ पीछे खींच लिए, तो फ्रांस की सरकार (CNC), जर्मनी, ब्राजील और नॉर्वे के सरकारी फंड्स ने इस कहानी की ताकत को पहचाना और इसे बनाने के लिए पैसा दिया। फिल्म समीक्षकों का कहना है कि यह भारत का एक बड़ा ‘सिस्टम फेलियर’ है। अगर भारतीय फिल्म बाजार ने इसे सपोर्ट किया होता, तो आज कान्स के मंच पर आधिकारिक तौर पर भारत का नाम भी चमका होता।