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भारत में 21 करोड़ लोग “HyperTension” का शिकार! 6.75 करोड़ लोग हैं बेखबर? जानिए इस ‘साइलेंट किलर’ का पूरा इतिहास

Chaturvedi Shruti V.
Last updated: May 16, 2026 5:19 pm
Chaturvedi Shruti V.
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जब हम हाई ब्लड प्रेशर का नाम सुनते हैं, तो आमतौर पर हमारे दिमाग में किसी बुजुर्ग व्यक्ति की तस्वीर आती है, जो गुस्से में है या जिसका शरीर कमजोर हो चुका है। लेकिन आज का कड़वा सच इससे बिल्कुल अलग है। एडवांस्ड लाइफस्टाइल, बदलता खान-पान और मेंटल स्ट्रेस ने इस बीमारी को एक ऐसे ‘साइलेंट किलर’ में बदल दिया है जो अब उम्र, जेंडर या सामाजिक स्थिति का भेद नहीं करता।

Contents
हाइपरटेंशन का इतिहासयंगस्टर्स – ‘कूल’ लाइफस्टाइल और करियर स्ट्रेस का शिकारफीमेल्स – हार्मोनल उतार-चढ़ाव और ‘मल्टीटास्किंग’ का भारी बोझमेल्स – सामाजिक दबाव और गुस्साबुजुर्ग – नसों की कमजोरी और अकेलापनएक्सपर्ट्स का कहना! अब नहीं तो कब?

2026 के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत में हर चार में से एक अडल्ट इस बीमारी का शिकार है, और इनमें से 27% लगभग (6.75 करोड़) लोग इस बात से पूरी तरह अनजान हैं कि उनके शरीर के अन्दर कोई गंभीर खतरा पनप रहा है।

हाइपरटेंशन का इतिहास

जब दुनिया को पहली बार पता चला इस बीमारी का, पहला वैज्ञानिक मामला (1874): लंदन में काम करने वाले एक आयरिश-भारतीय चिकित्सक, डॉ. महोमेड ने 1874 में पहली बार ऐसे मरीजों का पता लगाया, जिनका ब्लड प्रेशर बहुत अधिक था, लेकिन उनकी किडनी पूरी तरह स्वस्थ थी।

पहला ब्लड प्रेशर मॉनिटर: उस समय सटीक आधुनिक मशीनें नहीं थीं, इसलिए उन्होंने ‘स्फिग्मोग्राफ’ (sphygmograph) नाम के शुरुआती यंत्र से नाड़ी के दबाव को मापा। इसके बाद 1896 में ‘स्फिग्मोग्नोमैनोमीटर’ (Scipione Riva-Rocci द्वारा) के आविष्कार के बाद से बीपी को बांह पर कफ बांधकर मापना शुरू किया गया।

आइए समझते हैं कि यह जानलेवा बीमारी समाज के अलग-अलग वर्गों – युवाओं, महिलाओं, पुरुषों और बुजुर्गों पर किस तरह और क्यों अलग-अलग रूप में हमला कर रही है।

यंगस्टर्स – ‘कूल’ लाइफस्टाइल और करियर स्ट्रेस का शिकार


कुछ साल पहले तक 25 या 30 साल की उम्र में बीपी की दवा शुरू होना अकल्पनीय था, लेकिन आज यह बेहद आम हो चुका है। युवाओं में हाइपरटेंशन बढ़ने के मुख्य कारण उनकी रोजमर्रा की आदतें हैं:

क्रोनिक कॉर्पोरेट स्ट्रेस: करियर में आगे निकलने की होड़, 12-12 घंटे की शिफ्ट और टारगेट का दबाव युवाओं के नर्वस सिस्टम को हमेशा ‘फाइट या फ्लाइट’ मोड में रखता है, जिससे बीपी लगातार हाई रहता है।

खराब डाइट और पैकेज्ड फूड: पिज्जा, बर्गर, एक्स्ट्रा चीज और पैकेट बंद नमकीन, चिप्स के जरिए युवा तय मात्रा से कहीं ज्यादा सोडियम खा रहे हैं।

नींद की कमी और स्क्रीन टाइम: देर रात तक रील्स देखना, वेब सीरीज या गेमिंग के चक्कर में स्लीप साइकिल पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है। नींद की कमी सीधे तौर पर ब्लड प्रेशर को बढ़ाती है।

नशे की लत: स्मोकिंग, वेपिंग और वीकेंड अल्कोहल कल्चर नसों को सिकोड़ देता है, जिससे दिल पर दबाव बढ़ता है।

युवा अक्सर सिरदर्द या थकान को ‘काम का प्रेशर’ कहकर नजरअंदाज कर देते हैं, जो आगे चलकर कम उम्र में ही हार्ट अटैक का कारण बन रहा है।

फीमेल्स – हार्मोनल उतार-चढ़ाव और ‘मल्टीटास्किंग’ का भारी बोझ


महिलाओं में हाई ब्लड प्रेशर के ट्रिगर्स पुरुषों से काफी अलग और जटिल होते हैं। महिलाएं अक्सर अपनी सेहत को परिवार के पीछे छोड़ देती हैं, जिससे यह खतरा और बढ़ जाता है:

हार्मोनल बदलाव: महिलाओं के जीवन में आने वाले बड़े पड़ाव जैसे प्रेगनेंसी और मेनोपॉज बीपी को सीधे प्रभावित करते हैं। मेनोपॉज के बाद शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन कम होने से धमनियां सख्त होने लगती हैं।

प्रेग्नेंसी के दौरान खतरा: प्रेग्नेंसी में हाई बीपी ‘प्री-एक्लेम्पसिया’ का रूप ले सकता है। इससे गर्भनाल तक खून का बहाव कम हो जाता है, जिससे होने वाले बच्चे का विकास रुक सकता है, वजन कम रह सकता है या समय से पहले डिलीवरी करानी पड़ सकती है।

सुपरवुमन बनने का दबाव: घर और ऑफिस दोनों को परफेक्ट तरीके से संभालने के चक्कर में महिलाएं लगातार मानसिक तनाव और नींद की कमी से जूझती हैं। वे अक्सर चक्कर आने या सुस्ती को सामान्य कमजोरी समझकर टाल देती हैं।

मेल्स – सामाजिक दबाव और गुस्सा


पुरुषों में हाइपरटेंशन का खतरा शुरुआती उम्र से ही काफी अधिक होता है, लेकिन वे इसके प्रति सबसे ज्यादा लापरवाह होते हैं:

भावनाएं छिपाना और तनाव: समाज में पुरुषों पर ‘कमाऊ सदस्य’ होने का भारी दबाव होता है। अपनी चिंताओं या तनाव को खुलकर न कह पाने के कारण उनका मानसिक तनाव अंदर ही अंदर बीपी को बढ़ाता है।

चेकअप से दूरी: पुरुष अक्सर अपने डॉक्टर के पास जाने की आदत को टालते हैं। “मुझे कुछ नहीं हो सकता” वाला रवैया उन्हें रूटीन चेकअप से दूर रखता है।

गुस्सा और वर्कहॉलिक नेचर: गुस्सा और एग्रेसन सीधे तौर पर बीपी को स्पाइक (तेजी से बढ़ाना) करते हैं, जो मेल्स में ब्रेन हैमरेज या अचानक कार्डियक अरेस्ट का खतरा बढ़ा देता है।

बुजुर्ग – नसों की कमजोरी और अकेलापन


उम्र बढ़ने के साथ शरीर में प्राकृतिक बदलाव आते हैं, जो बुजुर्गों को हाइपरटेंशन के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील बनाते हैं:

आर्टरीज का कड़ा होना: उम्र बढ़ने के साथ ब्लड वेसल्स का लचीलापन कम होने लगता है, जिससे ब्लड प्रेशर का लेवल बढ़ना स्वाभाविक है।

अकेलापन और अवसाद: बुढ़ापे में बच्चों का दूर होना या जीवनसाथी का साथ छूट जाना बुजुर्गों को मानसिक रूप से तोड़ देता है। यह अकेलापन बीपी को अनियंत्रित कर देता है।

मल्टीपल बीमारियां: डायबिटीज, kidney की बीमारी या जोड़ों के दर्द के लिए ली जाने वाली कुछ दवाएं भी बुजुर्गों में बीपी को बढ़ा देती हैं, जिससे अंगों के फेल होने का खतरा रहता है।

एक्सपर्ट्स का कहना! अब नहीं तो कब?


एक्सपर्ट्स का इसे लेकर कहना है कि हाइपरटेंशन से बचने का एकमात्र रास्ता अपनी जीवनशैली में बदलाव करना है। इसके लिए ‘DASH’ (Dietary Approaches to Stop Hypertension) डाइट अपनाएं; खाने में नमक की मात्रा कम करें, अचार-पापड़ से दूरी बनाएं और हरी सब्जियां, फल व साबुत अनाज शामिल करें। रोजाना कम से कम 30 मिनट की वॉक, योग या मेडिटेशन को अपनी डेली-रूटीन का हिस्सा जरूर बनाएं।

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