ईरान से बढ़ते संघर्ष के बीच अब दुनिया की नजर हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर टिक गई है। यह वही संकरी समुद्री राह है, जहां से दुनिया का करीब 20% तेल, 20–30% LNG और वैश्विक उर्वरक व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। लेकिन अमेरिका-इजरायल के हमलों के बाद ईरान ने इस रास्ते पर दबाव बढ़ा दिया है और जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट आ गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यहां से गुजरने वाले जहाजों की संख्या 70 से 90% तक कम हो गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ तेल और गैस का संकट नहीं है, बल्कि इससे एक बड़ा “फर्टिलाइजर शॉक” यानी उर्वरक संकट पैदा हो सकता है, जिसका असर सीधे खेती और खाने की कीमतों पर पड़ेगा।
उर्वरक सप्लाई पर क्यों मंडरा रहा संकट
हॉर्मुज के रास्ते से यूरिया, अमोनिया, फॉस्फेट और सल्फर जैसे अहम उर्वरक दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचते हैं। ईरान खुद दुनिया के बड़े यूरिया और अमोनिया उत्पादकों में शामिल है, जबकि कतर, सऊदी अरब, ओमान और यूएई भी बड़े सप्लायर हैं।
लेकिन संघर्ष बढ़ने के बाद जहाजों का बीमा बेहद महंगा हो गया है और कई शिपिंग कंपनियां इस रास्ते से जाने से बच रही हैं। नतीजा यह है कि मध्य पूर्व से होने वाला करीब 35% यूरिया और 45% सल्फर निर्यात प्रभावित होने लगा है।
इसी का असर कीमतों पर भी दिख रहा है। मध्य पूर्व में यूरिया की कीमत 590 डॉलर प्रति टन से ऊपर पहुंच गई है, जो सिर्फ एक हफ्ते में करीब 19% बढ़ोतरी है। वहीं यूरोप में अमोनिया की कीमत करीब 725 डॉलर प्रति टन तक पहुंच चुकी है। किसान इस समय बुआई के मौसम के लिए उर्वरक जुटाने की कोशिश में हैं, लेकिन कमी से फसल उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबी चली तो 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध से भी बड़ा खाद्य संकट पैदा हो सकता है। ऐसे में ब्रेड, अंडे, चिकन और पोर्क जैसी रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं। दक्षिणी गोलार्ध में ब्राजील की सोयाबीन और एशिया की चावल की फसलों पर भी असर पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों बड़ी चिंता
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता है और बड़ी मात्रा में आयात पर निर्भर है। देश में म्यूरिएट ऑफ पोटाश का लगभग 100% और DAP का करीब 60% आयात होता है। यूरिया के मामले में भी 40% से ज्यादा सप्लाई मध्य पूर्व से आती है।
साल 2025-26 में भारत ने करीब 18 अरब डॉलर के उर्वरक आयात किए थे। इस दौरान यूरिया का आयात 8 मिलियन टन और DAP का 5 मिलियन टन तक पहुंच गया था।
संघर्ष की वजह से कतर से आने वाली LNG सप्लाई में रुकावट आई है, जिससे भारत के कई यूरिया प्लांटों ने उत्पादन घटा दिया है। कुछ प्लांटों में 30–40% तक कटौती की खबर है। अगर हॉर्मुज लंबे समय तक प्रभावित रहा तो यूरिया की कीमतें 30 से 40% तक बढ़ सकती हैं।
इसका सीधा असर सरकार की उर्वरक सब्सिडी पर पड़ेगा, जो पहले ही करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये के आसपास है। साथ ही जून से शुरू होने वाले खरीफ सीजन के लिए खाद का स्टॉक जुटाना भी मुश्किल हो सकता है, जिससे खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा है।
एक उद्योग विशेषज्ञ का कहना है कि अगर हॉर्मुज बंद हो गया तो उर्वरकों की आवाजाही बेहद सीमित हो जाएगी और कीमतें तेजी से बढ़ेंगी। कृषि विशेषज्ञ दीपक परीक के मुताबिक इससे यूरिया की लागत 30-40% तक बढ़ सकती है, जिसका बोझ किसानों और सरकार दोनों पर पड़ेगा।
आगे क्या कर सकता है भारत
विश्लेषकों का मानना है कि रूस जैसे देश कुछ हद तक सप्लाई दे सकते हैं, लेकिन पूरी कमी पूरी करना आसान नहीं होगा। चीन ने भी फॉस्फेट के निर्यात पर पहले से पाबंदी लगा रखी है।
ऐसे में भारत को उत्तर अफ्रीका और कनाडा जैसे वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी पड़ सकती है, साथ ही घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर देना होगा। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस संकट का पूरा असर शायद 2026 के अंत या 2027 तक साफ दिखाई देगा।