तेहरान में उथल-पुथल की खबरों के बीच लंदन में भी सियासत कम गर्म नहीं है। ब्रिटेन की जेलों में बंद फिलिस्तीन एक्शन समूह से जुड़े तीन कार्यकर्ता लंबे समय से भूख हड़ताल पर हैं और अब उनकी हालत गंभीर बताई जा रही है। सवाल यह है कि आखिर ये लोग अपनी जान दांव पर क्यों लगा रहे हैं?
31 वर्षीय हीबा मुरैसी 70 दिनों से अधिक समय से भूखे हैं, 28 साल के कामरान अहमद को 63–64 दिन हो चुके हैं, जबकि टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित 22–23 वर्षीय लेवी चियारामेलो वैकल्पिक दिनों में भोजन त्याग रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि ये सभी कार्यकर्ता “ज़िंदगी और मौत के बीच” पहुंच चुके हैं, लेकिन अपनी मांगों से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
इन पर इज़राइली डिफेंस कंपनी एल्बिट सिस्टम्स से जुड़े ठिकानों में तोड़फोड़ और RAF ब्राइज़ नॉर्टन एयरबेस पर विमानों पर लाल रंग डालने के आरोप हैं, जिन्हें वे खारिज करते हैं। असली विवाद तब शुरू हुआ जब ब्रिटिश सरकार ने फिलिस्तीन एक्शन को आतंकवादी संगठन घोषित कर ISIS और अल-कायदा की सूची में डाल दिया। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह फैसला शांतिपूर्ण विरोध को अपराध बना रहा है।
उनकी मांगें हैं—तुरंत जमानत, निष्पक्ष और समयबद्ध सुनवाई, संगठन पर लगे प्रतिबंध को हटाना और जेलों में कथित सेंसरशिप खत्म करना। चौंकाने वाली बात यह है कि ये लोग एक साल से ज्यादा समय से बिना ट्रायल के हिरासत में हैं, जबकि सुनवाई की तारीखें 2026–27 तक टल चुकी हैं।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि भूख हड़ताल आख़िरी विकल्प होती है, जब लोकतांत्रिक रास्ते बंद हो जाएं। अब सवाल यही है—क्या लंदन में यह सियासी आग समय रहते बुझाई जाएगी, या फिर यह मामला ब्रिटेन की मानवाधिकार छवि पर बड़ा सवाल छोड़ जाएगा?