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बड़े मोहरे बने छोटे दलों ने बिगाड़ा बिहार की सत्ता के पॉवर का बैलेंस! उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी पर नीतीश की नजर?

Afifa Malik
Last updated: December 27, 2025 1:08 pm
Afifa Malik
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क्या बिहार में बिगड़ जाएगा सत्ता समीकरण?
क्या बिहार में बिगड़ जाएगा सत्ता समीकरण?
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बिहार की राजनीति में आज सवाल सत्ता का नहीं, सत्ता के संतुलन का है। गठबंधन के मुख्यमंत्री भले ही नीतीश कुमार हों, लेकिन गठबंधन के भीतर खींचतान साफ दिखाई दे रही है। एक तरफ बीजेपी है, जो विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद मुख्यमंत्री पद से दूर है, और दूसरी तरफ जेडीयू है, जो कुर्सी पर बैठी है लेकिन संख्या के खेल में कमजोर पड़ती दिख रही है। इसी टकराव के बीच बिहार की राजनीति में छोटे दल बड़े मोहरे बनते जा रहे हैं और यहीं से कहानी जुड़ती है उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा से।

NDA सरकार बनने के बाद यह साफ हो गया था कि सत्ता सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी तक सीमित नहीं रहेगी। गृह मंत्रालय और विधानसभा अध्यक्ष जैसे दो बेहद अहम पद बीजेपी के पास चले गए। ये वही विभाग हैं, जो लंबे समय तक जेडीयू के नियंत्रण में रहे थे। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक यहीं से जेडीयू और बीजेपी के बीच ‘पावर शेयरिंग’ को लेकर असहजता बढ़ी। जेडीयू को यह संदेश गया कि बीजेपी सिर्फ सहयोगी नहीं, बल्कि बराबरी से ऊपर की भूमिका में आना चाहती है।

इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय लोक मोर्चा जैसे छोटे दलों की अहमियत अचानक बढ़ जाती है। विधानसभा में बीजेपी के पास 89 विधायक हैं, जेडीयू के पास 85। दोनों के बीच का यह मामूली अंतर भविष्य में किसी भी फ्लोर टेस्ट को बेहद संवेदनशील बना सकता है। ऐसे में हर विधायक, हर सीट और हर छोटी पार्टी सत्ता की रणनीति का हिस्सा बन जाती है।

अब आते हैं राष्ट्रीय लोक मोर्चा पर, जहां बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाने की कोशिश हो रही है, लेकिन अंदर हलचल तेज है। शुक्रवार को सासाराम में मौजूद उपेंद्र कुशवाहा ने पार्टी में टूट की खबरों को सिरे से खारिज कर दिया। पत्रकारों ने उनसे सवाल किया जिस पर उन्होंने जवाब दिया कि उनकी पार्टी में किसी प्रकार की टूट का कोई सवाल ही नहीं है।

लेकिन 24 दिसंबर की रात पटना में आयोजित लिट्टी-चोखा भोज में जो कुछ हुआ उसने इस कहानी को नया मोड़ दिया। पार्टी के कुल चार विधायकों में से तीन विधायक, माधव आनंद, आलोक सिंह और रामेश्वर महतो, इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए थे। उसी दिन ये तीनों विधायक बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात करते नजर आए। यह मुलाकात सामान्य शिष्टाचार कही गई, लेकिन टाइमिंग और संदर्भ ने इसे राजनीतिक संकेत बना दिया।
पार्टी के भीतर असंतोष की वजह भी अब खुलकर सामने आ रही है। सूत्र बताते हैं कि उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए जाने से कई विधायक नाराज़ हैं।

राष्ट्रीय लोक मोर्चा के पास सिर्फ चार विधायक हैं, लेकिन मौजूदा सत्ता समीकरण में यही चार विधायक बेहद कीमती हो जाते हैं। अगर इनमें से तीन भी अलग राह चुनते हैं, तो NDA के भीतर संतुलन भी बदल सकता है। इसी कड़ी में 25 दिसंबर को पार्टी के व्यवसायिक प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष अनंत कुमार गुप्ता समेत आठ नेताओं का इस्तीफा देना और जेडीयू में शामिल होने का ऐलान इस बात का संकेत देता है कि संगठन स्तर पर भी सब कुछ ठीक नहीं है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी और जेडीयू दोनों की नजर भविष्य पर है। बीजेपी चाहती है कि वह सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी न रहे, बल्कि मुख्यमंत्री पद पर भी दावा मजबूत करे। वहीं जेडीयू को डर है कि अगर संख्या का खेल बिगड़ा, तो कुर्सी खतरे में पड़ सकती है। इसी डर और रणनीति के बीच छोटे दलों में सेंध की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

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TAGGED: Bihar Assembly Politics, Bihar political news, BJP JDU Conflict, IndianPressHouse, NDA Power Struggle, Nitish Kumar Government, Political Defection Bihar, Rashtriya Lok Morcha Crisis, Upendra Kushwaha Party
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