रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने बुधवार को अपने रक्षा मंत्रालय की वार्षिक बैठक में यूरोपीय नेताओं पर तीखा हमला बोलते हुए माहौल गरमा दिया। अपने चिर-परिचित आक्रामक अंदाज़ में पुतिन ने यूरोप के नेताओं को “पिगलेट्स” कहकर तंज कसा और साफ कहा कि अगर कीव और उसके पश्चिमी समर्थक अमेरिका की मध्यस्थता वाले शांति प्रस्तावों पर गंभीरता से बात नहीं करते, तो रूस सैन्य ताकत के जरिए यूक्रेन के और इलाकों को “मुक्त” करने से पीछे नहीं हटेगा। पुतिन के इस बयान को सीधे तौर पर पश्चिम के लिए चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
यूक्रेन पर सख्त रुख और युद्ध की चेतावनी
बैठक में पुतिन ने दो टूक कहा कि रूस अपने युद्ध लक्ष्यों से समझौता नहीं करेगा। उनके मुताबिक डोनबास समेत जिन क्षेत्रों को रूस अपनी “ऐतिहासिक भूमि” मानता है, उन्हें या तो कूटनीति के जरिए या फिर बल प्रयोग से हासिल किया जाएगा। पुतिन ने दावा किया कि रूसी सेना इस वक्त पूरे मोर्चे पर रणनीतिक बढ़त बनाए हुए है और साल 2025 में अब तक 300 से ज्यादा बस्तियों को अपने नियंत्रण में लिया जा चुका है। रक्षा मंत्री आंद्रेई बेलौसोव ने भी संकेत दिए कि 2026 में सैन्य अभियानों की गति और तेज की जाएगी, जिससे साफ है कि मॉस्को किसी भी तरह पीछे हटने के मूड में नहीं है।
अमेरिका से उम्मीद, यूरोप पर हमला
पुतिन ने अमेरिका के प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख दिखाते हुए नए अमेरिकी प्रशासन के साथ चल रही बातचीत को सकारात्मक बताया और कहा कि इससे शांति की संभावनाएं बन सकती हैं। इसके उलट उन्होंने यूरोपीय नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए और कहा कि वे जानबूझकर युद्ध को लंबा खींचना चाहते हैं। पुतिन ने पूर्व अमेरिकी प्रशासन पर भी संघर्ष भड़काने का आरोप लगाते हुए कहा कि यूरोपीय नेता उस रणनीति में तुरंत शामिल हो गए थे, ताकि रूस को कमजोर कर अपने हित साध सकें। उन्होंने मौजूदा यूरोपीय नेतृत्व को “गिरावट” का शिकार बताया और कहा कि ऐसे हालात में सार्थक शांति वार्ता आसान नहीं है।
पुतिन के इन बयानों से यूरोपीय संघ और नाटो के साथ रूस के रिश्तों में और तल्खी आने की आशंका है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बयानबाजी रूस की कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है, जिसका मकसद पश्चिमी देशों पर दबाव बनाना और उनकी एकजुटता को कमजोर करना है, जबकि जमीनी स्तर पर युद्ध और बातचीत दोनों मोर्चों पर रूस अपनी स्थिति मजबूत रखने की कोशिश कर रहा है।