भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उत्तर प्रदेश इकाई को नया प्रदेश अध्यक्ष मिलने जा रहा है। केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री और महाराजगंज से सात बार के सांसद पंकज चौधरी ने प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल किया, जो निर्विरोध रहा। इससे उनके चयन की औपचारिक घोषणा अब केवल समय की बात है। नामांकन प्रक्रिया में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य तथा ब्रजेश पाठक सहित पार्टी के शीर्ष नेता प्रस्तावक बने।
पंकज चौधरी का चयन पार्टी की 2027 विधानसभा चुनावों की तैयारी और ओबीसी (विशेष रूप से कुर्मी समाज) वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
लेकिन एक बड़ा सवाल जो लंबे समय से उठता रहा है, वह यह कि भाजपा उत्तर प्रदेश में अब तक किसी दलित चेहरे को प्रदेश अध्यक्ष क्यों नहीं बना सकी? पार्टी जमीनी स्तर पर दलितों को जिला अध्यक्ष बनाती है, लेकिन राज्य स्तर की कमान हमेशा सवर्ण (मुख्य रूप से ब्राह्मण) या ओबीसी नेताओं के हाथ रही है।
अब तक के प्रदेश अध्यक्षों की जाति-आधारित सूची
भाजपा उत्तर प्रदेश की स्थापना (1980) से लेकर अब तक के प्रमुख प्रदेश अध्यक्षों की जाति इस प्रकार रही है:
- माधव प्रसाद त्रिपाठी (प्रारंभिक दौर): ब्राह्मण
- कलराज मिश्र: ब्राह्मण
- लक्ष्मीकांत वाजपेयी: ब्राह्मण
- राम प्रकाश गुप्त: वैश्य/बनिया (सवर्ण)
- कल्याण सिंह: लोध (ओबीसी) – पहला ओबीसी अध्यक्ष
- केसरी नाथ त्रिपाठी: ब्राह्मण
- राम नाथ कोविंद (राष्ट्रीय स्तर पर दलित मोर्चा प्रमुख रहे, लेकिन UP प्रदेश अध्यक्ष नहीं बने)
- लक्ष्मीकांत बाजपेयी: ब्राह्मण
- केसव प्रसाद मौर्य (2016-2017): मौर्य (ओबीसी, कुशवाहा समुदाय)
- महेंद्र नाथ पांडे: ब्राह्मण
- स्वतंत्र देव सिंह (2019-2022): कुर्मी (ओबीसी)
- भूपेंद्र सिंह चौधरी (2022-2025): जाट (ओबीसी)
- पंकज चौधरी (नया, 2025 से): कुर्मी (ओबीसी)
अब तक कोई भी दलित (अनुसूचित जाति) चेहरा उत्तर प्रदेश भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष नहीं बना। अधिकांश अध्यक्ष ब्राह्मण (सवर्ण) रहे, जबकि हाल के वर्षों में ओबीसी (कुर्मी, मौर्य, जाट, लोध) नेताओं को प्राथमिकता मिली है।
दलित को प्रदेश अध्यक्ष क्यों नहीं बनाया गया?
उत्तर प्रदेश में दलित वोट (लगभग 21%) मुख्य रूप से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) के PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले से प्रभावित रहते हैं। भाजपा ने दलितों में गैर-जाटव (पासी, कोरी आदि) को लक्ष्य करके वोट हासिल किए, लेकिन संगठन की शीर्ष कमान सवर्ण या प्रमुख ओबीसी जातियों (कुर्मी, मौर्य) को दी जाती है। दलित नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाने से पार्टी को “दलित-विरोधी” या बसपा जैसी छवि का खतरा माना जाता है।
पार्टी की स्थापना से लेकर 2000 के दशक तक ब्राह्मण नेताओं का दबदबा रहा (लगभग 20 वर्ष)। 2014 के बाद मोदी-योगी युग में नॉन-यादव ओबीसी (कुर्मी, मौर्य, लोध, जाट) को प्रमोट किया गया, क्योंकि ये जातियां संख्यात्मक रूप से मजबूत हैं और हिंदुत्व के साथ जुड़ाव रखती हैं। दलितों को जिला स्तर या मोर्चा (दलित मोर्चा) में जगह मिलती है, लेकिन राज्य अध्यक्ष जैसे पद पर नहीं।
RSS की भूमिका और झुकाव
भाजपा के संगठन में आरएसएस की भूमिका प्रमुख है। आरएसएस का आधार मुख्य रूप से सवर्ण रहा है, हालांकि अब ओबीसी को शामिल किया जा रहा है। दलित नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर (जैसे राम नाथ कोविंद राष्ट्रपति बने) प्रमोट किया जाता है, लेकिन UP जैसे बड़े राज्य में जोखिम नहीं लिया जाता।
2024 लोकसभा में PDA फॉर्मूले से नुकसान के बाद भाजपा ने जिला अध्यक्षों में दलितों (6-7 SC) को जगह दी, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष फिर ओबीसी (कुर्मी) चुना गया। पंकज चौधरी का चयन पूर्वांचल और कुर्मी वोट को मजबूत करने के लिए है, जहां पार्टी को 2024 में झटका लगा।
सपा और बसपा अक्सर भाजपा पर “दलितों को सिर्फ वोट बैंक मानने” का आरोप लगाते हैं। भाजपा का जवाब है कि वह दलितों को टिकट, मंत्री पद और योजनाओं (जैसे SC/ST एक्ट में बदलाव का विरोध) से सशक्त बनाती है, लेकिन संगठन की कमान “सामर्थ्य और अनुभव” के आधार पर दी जाती है।
बदलाव की संभावना?
भाजपा में दलित चेहरे जैसे विद्या सागर सोनकर, राम शंकर कठेरिया या जुगल किशोर को कभी चर्चा में लाया जाता है, लेकिन अंतिम निर्णय ओबीसी या सवर्ण की ओर झुकता है। 2027 चुनावों में PDA को काउंटर करने के लिए दलित अध्यक्ष की संभावना कम है, क्योंकि पार्टी कुर्मी-मौर्य जैसे मजबूत ओबीसी समीकरण पर भरोसा कर रही है। यह चयन भाजपा की “सोशल इंजीनियरिंग” को दर्शाता है, जहां दलितों को शामिल तो किया जाता है, लेकिन शीर्ष नेतृत्व से दूर रखा जाता है।