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13 दिन में बिखर गई 28 साल पुरानी TMC! आखिर ममता बनर्जी की पार्टी में कहां हुई चूक?

कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर शुरू हुआ असंतोष अब खुलकर सामने आ गया है। 28 साल पहले जिस पार्टी की नींव ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर रखी थी, वही पार्टी अब कई गुटों में बंटती दिखाई दे रही है। चुनावी हार के बाद शुरू हुआ राजनीतिक घटनाक्रम महज 13 दिनों में ऐसे मोड़ पर पहुंच गया, जहां पार्टी नेतृत्व के सामने संगठन को एकजुट रखना बड़ी चुनौती बन गया है।

22 मई को दिल्ली स्थित बंगा भवन में बागी विधायक ऋतब्रता बनर्जी और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के बीच हुई मुलाकात के बाद घटनाक्रम ने तेजी पकड़ी। इसके बाद पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा और आखिरकार बड़ी संख्या में विधायकों ने अलग राह पकड़ ली।

कैसे शुरू हुई बगावत की कहानी?

चुनाव में हार के बाद पार्टी के कई नेताओं और विधायकों में नेतृत्व को लेकर नाराजगी बढ़ने लगी। असंतुष्ट खेमे का आरोप था कि संगठन और फैसलों का केंद्र सीमित दायरे में सिमटता जा रहा है। धीरे-धीरे यह नाराजगी खुली बगावत में बदल गई और पार्टी के भीतर दो स्पष्ट धड़े बनते नजर आने लगे।

उत्तराधिकार की राजनीति बनी बड़ा मुद्दा

पार्टी के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा नेतृत्व के भविष्य को लेकर रही। कई वरिष्ठ नेताओं को लगने लगा कि संगठन में कुछ चेहरों का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, जबकि पुराने नेताओं की भूमिका सीमित होती जा रही है। इसी वजह से पार्टी के अंदर असंतोष की भावना मजबूत होती चली गई।

पुराने और नए नेताओं के बीच बढ़ी दूरी

तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से दो धाराओं में बंटी दिखाई देती रही है। एक ओर वे नेता रहे जिन्होंने पार्टी के संघर्ष के दौर में अहम भूमिका निभाई, जबकि दूसरी ओर नई पीढ़ी के नेताओं का प्रभाव बढ़ता गया। दोनों गुटों के बीच तालमेल की कमी समय के साथ संगठनात्मक चुनौती बनती चली गई।

चुनावी रणनीति और संगठन में बदलाव भी बना कारण

पार्टी के कामकाज में समय-समय पर हुए बदलावों को लेकर भी कई नेताओं ने असहमति जताई। टिकट वितरण, संगठनात्मक फैसलों और स्थानीय नेतृत्व की भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठते रहे। कई नेताओं को लगा कि उनकी राजनीतिक अहमियत पहले जैसी नहीं रही।

भ्रष्टाचार के आरोपों से छवि को नुकसान

पिछले कुछ वर्षों में सामने आए विभिन्न मामलों और जांच एजेंसियों की कार्रवाई ने भी पार्टी की छवि को प्रभावित किया। कई बड़े नेताओं के नाम विवादों में आने से संगठन के भीतर असहजता बढ़ी और इसका असर राजनीतिक एकजुटता पर भी पड़ा।

विपक्ष के मजबूत होने से बढ़ा दबाव

राज्य में विपक्ष के लगातार मजबूत होने से भी पार्टी के भीतर असुरक्षा की भावना बढ़ी। कुछ नेताओं को लगा कि बदलते राजनीतिक समीकरणों में उनके लिए नए विकल्प मौजूद हैं, जिससे संगठन में टूट की प्रक्रिया तेज हो गई।

स्थानीय नेताओं की नाराजगी भी बनी वजह

कई क्षेत्रीय नेताओं का मानना था कि जिलों और स्थानीय इकाइयों को अपेक्षित स्वतंत्रता नहीं मिल रही है। फैसलों के केंद्रीकरण को लेकर लंबे समय से असंतोष मौजूद था, जो चुनावी हार के बाद और ज्यादा उभरकर सामने आया।

गुटबाजी ने कमजोर की संगठनात्मक पकड़

तृणमूल कांग्रेस के कई जिलों में लंबे समय से स्थानीय स्तर पर गुटबाजी की शिकायतें रही हैं। टिकट वितरण और संगठनात्मक पदों को लेकर चलने वाली प्रतिस्पर्धा ने कई बार आंतरिक संघर्ष को जन्म दिया, जिसका असर अब खुलकर दिखाई दे रहा है।

वैचारिक आधार की कमी भी बनी चुनौती

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी की पहचान लंबे समय तक एक मजबूत नेतृत्व और सत्ता विरोधी राजनीति के इर्द-गिर्द बनी रही। बदलते राजनीतिक माहौल में संगठन को एकजुट रखने के लिए मजबूत वैचारिक आधार की जरूरत महसूस की जाने लगी, जिसकी कमी अब साफ दिखाई दे रही है।

13 दिनों में बदल गई राजनीतिक तस्वीर

22 मई से शुरू हुआ घटनाक्रम कुछ ही दिनों में पार्टी के लिए सबसे बड़े राजनीतिक संकट में बदल गया। चुनावी हार, नेतृत्व को लेकर असंतोष, संगठनात्मक मतभेद और बदलते राजनीतिक समीकरणों ने मिलकर ऐसी स्थिति पैदा कर दी, जिसने 28 साल पुरानी पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

vineet verma

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